जब तक अनुसूचित जाति को सत्ता और सम्मान में उनकी वाजिब हिस्सेदारी नहीं मिलती, झारखंड का नवनिर्माण एक ऐसा ‘अधूरा गीत’ रहेगा, जिसके सुर तो हैं, पर आत्मा नदारद है। और बिना आत्मा का शरीर, अंततः सड़ जाता है।
रांची: झारखंड का उदय महज भारत के मानचित्र पर एक नई लकीर खींचना नहीं था; यह सदियों से कुचली गई उस ‘चेतना’ का विस्फोट था, जो अपने अस्तित्व का प्रमाण मांग रही थी। किंतु विडंबना देखिए, दशकों बाद जब हम राज्य के ‘नवनिर्माण’ का दंभ भरते हैं, तो अनुसूचित जाति (SC) की स्थिति उस धुंधले आईने जैसी है, जिसमें हमारी व्यवस्था अपना ही चेहरा देखने से कतराती है।
विकास के चमकते होर्डिंग्स के पीछे पसरा सन्नाटा चीख-चीख कर एक ही गवाही दे रहा है—सत्ता का हस्तांतरण ‘परिवर्तन’ नहीं होता। असली बदलाव तब आता है जब सत्ता का ‘चरित्र’ बदलता है। कड़वा सच यह है कि झारखंड की व्यवस्था ने केवल चोला बदला है; उसकी आत्मा आज भी वही पुरानी, संवेदनहीन और सामंती है।

रोटी से आगे: अस्मिता की हुंकार
राजनीतिक दलों ने लंबे समय तक यह मुगालता पाले रखा कि वंचित समाज की भूख केवल ‘पेट’ तक सीमित है। उन्हें लगा कि योजनाओं के कुछ टुकड़े फेंककर वे इस समाज की ‘आत्मा’ को खरीद लेंगे। यह उनकी ऐतिहासिक भूल थी। “आज का संघर्ष ‘खैरात’ का नहीं, ‘गरिमा‘ का है। यह याचना का नहीं, ‘भागीदारी‘ का है।”
जब सत्ता किसी को ‘लाभार्थी’ कहकर पुकारती है, तो वह अनजाने में उसे यह याद दिलाती है कि वह आश्रित है। लेकिन यह समाज अब जागृत है। वह फाइलों में दबे निर्जीव आंकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली मेज पर, सत्ता के गलियारों में, आँखों में आँखें डालकर अपने ‘स्वत्व’ का हिसाब मांग रहा है।
इतिहास की अदालत: एक निष्ठुर चेतावनी
उन ‘नेताओं’ और ‘दलों’ के लिए, जो इस समाज को महज एक ‘वोट बैंक’ या सत्ता की सीढ़ी समझते आए हैं, समय की चेतावनी स्पष्ट है—सामाजिक स्मृति बहुत गहरी होती है। इतिहास गवाह है कि समय सब कुछ माफ कर सकता है, लेकिन ‘विश्वासघात’ को कभी नहीं।
वातानुकूलित कक्षों में बैठकर जो लोग इस समाज की अनदेखी को अपनी ‘राजनीतिक चालाकी’ समझ रहे हैं, वे वास्तव में बारूद के ढेर पर बैठकर चिंगारी से खेल रहे हैं। इतिहास की कलम जब न्याय लिखती है, तो वह निष्ठुर होती है। आज का यह ‘मौन’ कल उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए ऐसा ‘शोर’ बनेगा, जिसे कोई नहीं दबा सकेगा। सामूहिक चेतना उन लोगों को कभी क्षमा नहीं करती, जिन्होंने उम्मीदों का सौदा किया और गरिमा को सत्ता की चौखट पर गिरवी रख दिया।
अधूरा गीत
झारखंड का नवनिर्माण ईंट-गारे या कंक्रीट की सड़कों से नहीं होगा। यह तब होगा जब हम स्वीकार करेंगे कि सम्मान के बिना दिया गया विकास, विकास नहीं, बल्कि एक ‘सभ्य अपमान‘ है।
राज्य का भविष्य योजनाओं की गिनती पर नहीं, बल्कि इस बात पर टिका है कि हमने समाज के अंतिम व्यक्ति की रीढ़ सीधी की या नहीं। इतिहास की नजरों से बचकर कोई नहीं जा सकता। जब तक अनुसूचित जाति को सत्ता और सम्मान में उनकी वाजिब हिस्सेदारी नहीं मिलती, झारखंड का नवनिर्माण एक ऐसा ‘अधूरा गीत’ रहेगा, जिसके सुर तो हैं, पर आत्मा नदारद है। और बिना आत्मा का शरीर, अंततः सड़ जाता है।