झारखंड: दूसरों की बारात सजाते-सजाते, वे अपनी जवानी की अर्थी ढो रहे हैं। यह संगीत नहीं, यह एक सामाजिक विलाप है जिसे डीजे के शोर में अनसुना कर दिया गया है।
रांची: जब किसी शहर की सड़क से कोई भव्य बारात गुजरती है, तो दुनिया की नज़रें दूल्हे की शेरवानी या नाचते हुए बारातियों पर होती हैं। लेकिन क्या कभी आपने उस भीड़ के आगे चलते उन युवाओं की आँखों में देखा है, जिनके कंधों पर भारी ‘ब्रास-बैंड’ (Brass Band) के वाद्ययंत्र लदे होते हैं? ये युवा अक्सर झारखंड के उसी घासी, डोम या मुसहर (SC) समाज से आते हैं, जिनके पूर्वज कभी राजाओं के दरबार में ‘नायक’ हुआ करते थे। आज, समय के क्रूर पहिये ने उन्हें ‘बैंड-वाला’ बना दिया है—जहाँ वे खुशियाँ बेचते तो हैं, पर खरीद नहीं सकते।
चमकदार वर्दी के पीछे का फटेहाल सच
शादी के उस कुछ घंटों के जश्न के लिए ये युवा एक अजीबोगरीब ‘वर्दी’ पहनते हैं—लाल, नीली, सुनहरी झालरों वाली, जो दूर से किसी ‘कमांडर’ या ‘राजा’ जैसी दिखती है। यह समाज का सबसे बड़ा व्यंग्य है। जिस समाज (SC) को सदियों से अच्छे कपड़े पहनने से रोका गया, उसे आज शादी की रात ‘राजा’ जैसे कपड़े पहनाकर सड़क पर चलाया जाता है। लेकिन वह वर्दी उनकी नहीं, ‘किराये’ की है।
उस चमकती हुई वर्दी के भीतर पसीने से लथपथ एक ऐसा युवा है, जो शायद स्कूल छोड़ चुका है, जिसका अपना घर कच्चा है, और जिसे यह भी नहीं पता कि आज रात उसे भरपेट खाना मिलेगा या बारात के बचे हुए जूठन से पेट भरना होगा।
सुरों का बोझ और फेफड़ों की लड़ाई
ट्रम्पेट (Trumpet), ट्रम्बोन या भारी-भरकम ड्रम बजाना कोई आसान काम नहीं है। एक बारात को 2-3 किलोमीटर रेंगते हुए चलने में घंटों लग जाते हैं।
- जरा उस लड़के के बारे में सोचिए जो अपने सीने की पूरी हवा एक ‘तूतारी’ या ‘क्लारिनेट’ में फूँक रहा है, ताकि बाराती ‘नागिन धुन’ पर नाच सकें।
- उस युवा को देखिए जो 20 किलो का ड्रम गले में टांगे हुए है।
- और सबसे दर्दनाक स्थिति उन लड़कों की है जो ‘लाइट‘ (Lightmen) उठाते हैं—सिर पर भारी जेनरेटर और हाथों में चकाचौंध करती ट्यूबलाइट्स। वे रोशनी तो दूसरों को दिखाते हैं, पर उनके अपने पैरों के नीचे सिर्फ़ अँधेरा होता है।
ये युवा अपने फेफड़े और जवानी गला रहे हैं, मात्र 300 या 500 रुपये की दिहाड़ी के लिए। न कोई स्वास्थ्य बीमा, न कोई भविष्य निधि, और न ही कोई इज़्ज़त।
उत्सव के शोर में सामाजिक सन्नाटा
बारात में जब लोग नोट उड़ाते हैं (न्योछावर), तो वे पैसे ज़मीन पर गिरते हैं। बैंड बजाने वाला युवा उन नोटों को ललचाई नज़रों से देखता तो है, पर उठा नहीं सकता—क्योंकि उसके हाथ साज़ से बंधे हैं और सामाजिक मर्यादाओं ने उसे ‘सेवक’ बना रखा है।
विडंबना यह है कि वे ‘मनोरंजन के साधन‘ हैं, ‘इंसान’ नहीं। बारात ख़त्म होते ही, जब दूल्हा मंडप में जाता है, ये ‘वर्दी वाले राजा’ सड़क के किनारे, किसी ढाबे के बाहर या फुटपाथ पर सुस्ताते हुए नज़र आते हैं। जिस समाज की खुशी के लिए उन्होंने रात काली की, वह समाज उन्हें एक गिलास पानी के लिए भी शायद ही पूछता है।
आर्थिक सुरक्षा का अभाव: एक बेसुरा जीवन
ये युवा असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) के सबसे निचले पायदान पर हैं। बैंड का काम मौसमी (Seasonal) होता है। शादी का सीज़न ख़त्म होते ही ये वापस बेरोज़गारी के दलदल में गिर जाते हैं। सरकार की नज़र में ये ‘कलाकार’ नहीं, बल्कि ‘मज़दूर’ हैं। इनके पास न तो लेबर कार्ड होता है और न ही आर्टिस्ट कार्ड। एक दुर्घटना, एक बीमारी, या वाद्ययंत्र का टूट जाना—इनके पूरे परिवार को भुखमरी की कगार पर ला सकता है।
सुनना होगा वह संगीत जो बजाया नहीं गया
झारखंड के ये SC युवा, जो अपनी पारंपरिक लय को ‘बॉलीवुड’ की धुनों में बदलने को मजबूर हैं, वे सिर्फ़ वाद्य नहीं बजा रहे, वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमें समझना होगा कि उनकी वर्दी का रंग चाहे कितना भी गहरा हो, उनकी गरीबी का रंग उससे कहीं ज्यादा गहरा है।
अगली बार जब आप किसी बारात में नाचें, तो एक पल रुककर उस ट्रम्पेट बजाने वाले युवा को सम्मान की नज़र से ज़रूर देखें। शायद आपकी एक मुस्कान या सम्मानजनक व्यवहार उसे यह अहसास दिला सके कि वह केवल एक ‘बाजा बजाने वाला’ नहीं, बल्कि एक हुनरमंद इंसान है। सरकार को चाहिए कि ‘बैंड बाजा’ उद्योग को विनियमित करे और इन युवाओं को सामाजिक सुरक्षा, बीमा और गरिमा का कवच प्रदान करे।