झारखंड: शराब ठेकेदारी में दलित भागीदारी की हकीकत

झारखंड: शराब ठेकेदारी में SC समाज की भागीदारी वर्तमान में एक ‘मृगतृष्णा’ के समान है। ई-लॉटरी ने दरवाजा तो खोला है, लेकिन देहरी बहुत ऊँची कर दी है।

रांची: झारखंड की नई आबकारी नीति उस ‘मृगतृष्णा’ का सरकारी संस्करण है, जहाँ सामाजिक न्याय की थाली तो परोसी गई है, मगर उसमें भोजन की जगह केवल ‘पात्रता की शर्तें’ रखी हैं। ई-लॉटरी का यह ‘लोकतांत्रिक जुआ’ दलित समाज को व्यापार का सम्राट बनने का न्योता तो देता है, लेकिन तिजोरी की चाबी पहले ही ‘बैंक गारंटी’ और ‘सॉल्वेंसी’ के रसूखदार पहरेदारों को सौंप दी गई है।

यह वैसा ही क्रूर उपहास है, जैसे किसी नंगे पैर चलने वाले को एवरेस्ट फतह करने का ‘आरक्षित लाइसेंस’ दे देना, बशर्ते वह ऑक्सीजन और महंगे उपकरण अपनी शून्य जेब से खरीदे। अंततः, कागजों पर नाम ‘हाशिए के समाज’ का दर्ज होता है, और परदे के पीछे जाम ‘पुराने सिंडिकेट’ का ही छलकता है।

शराब ठेकेदारी में दलित

पूंजी, लॉटरी और सामाजिक न्याय का द्वंद्व: मंशा और यथार्थ के बीच की खाई

झारखंड की नई उत्पाद नीति (2025) केवल राजस्व का एक दस्तावेज नहीं, बल्कि राज्य के सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोधों का एक जीवित उदाहरण है। जहाँ एक ओर सरकार ने “अबुआ राज” की परिकल्पना में वंचितों को सत्ता और व्यापार में हिस्सेदारी देने का स्वप्न देखा था, वहीं दूसरी ओर शराब ठेकेदारी की ‘ई-लॉटरी प्रणाली’ ने यह सिद्ध कर दिया है कि बाजार के नियम अक्सर सामाजिक न्याय की भावनाओं पर भारी पड़ते हैं।

​”समान अवसर” का भ्रम और पूंजी की दीवार

सरकार द्वारा अपनाई गई लॉटरी प्रणाली को पारदर्शिता का प्रतीक बताया गया, लेकिन दलित (SC) समाज के लिए यह एक ‘दोधारी तलवार’ है।

  • समीक्षा: लॉटरी ने मानवीय भेदभाव (सिफारिश) को तो खत्म किया, लेकिन वित्तीय शोधन क्षमता‘ (Financial Solvency) की शर्त लगाकर एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी। लाखों रुपये की लाइसेंस फीस, सिक्योरिटी डिपॉजिट और पर्सनल बॉन्ड की शर्तें एक सामान्य दलित उद्यमी के लिए लोहे के चने चबाने जैसी हैं।
  • मार्मिक सत्य: जब चयन का आधार ‘भाग्य’ (लॉटरी) और ‘धन’ (सॉल्वेंसी) हो, तो ऐतिहासिक रूप से वंचित समाज, जिसके पास न तो पुश्तैनी पूंजी है और न ही बैंकों का भरोसा, वह ‘निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा’ में भी हारने के लिए अभिशप्त होता है।

​आरक्षण: कागज पर शोर, धरातल पर मौन

रिपोर्टों से स्पष्ट है कि सरकारी निर्माण ठेकों (25 लाख तक) में आरक्षण के नियम स्पष्ट और कड़े हैं, लेकिन शराब के ‘लुभावने व्यापार’ में आरक्षण की स्थिति धुंधली है।

  • नीतिगत विरोधाभास: 2020 की घोषणाओं में SC/ST को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी, लेकिन 2025 की नियमावली में ‘कोटा’ से अधिक जोर ‘राजस्व’ पर है। यह दर्शाता है कि सरकार छोटे ठेकों में तो हिस्सेदारी दे सकती है, लेकिन जब बात ‘बड़े राजस्व’ (Liquor Revenue) की आती है, तो तंत्र अनजाने में ही बड़े खिलाड़ियों (सिंडिकेट) के पक्ष में झुक जाता है।

​’बेनामी’ संस्कृति और अस्तित्व का संकट

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे काला अध्याय ‘बेनामी संचालन’ की आशंका है। यदि कोई SC आवेदक लॉटरी जीत भी जाता है, तो पूंजी के अभाव में वह अंततः किसी रसूखदार ‘सिंडिकेट’ का मोहरा मात्र बनकर रह जाता है। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि ‘स्वाभिमान का सौदा’ है। लाइसेंस दलित के नाम पर होता है, लेकिन मुनाफा और नियंत्रण पूंजीपति के पास। यह भागीदारी नहीं, बल्कि शोषण का ही एक आधुनिक और वैध रूप है।

भविष्य की दिशा

झारखंड में शराब ठेकेदारी में SC समाज की भागीदारी वर्तमान में एक ‘मृगतृष्णा’ के समान है। ई-लॉटरी ने दरवाजा तो खोला है, लेकिन देहरी बहुत ऊँची कर दी है। वास्तविक न्याय तब होगा जब सरकार केवल ‘लाइसेंस’ आरक्षित न करे, बल्कि उस लाइसेंस को चलाने के लिए ‘सुलभ पूंजी’ (Soft Loans) और ‘बाजार संरक्षण’ भी प्रदान करे। अन्यथा, 2025 की नीति इतिहास में एक ऐसे प्रयोग के रूप में दर्ज होगी जहाँ ‘अवसर’ तो सबको मिला, लेकिन ‘सफलता’ केवल उसे मिली जिसकी जेब पहले से भरी थी।

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