CSR में अनदेखी: नीतिगत स्पष्टता की कमी और फंड के डायवर्जन के कारण SC समाज पिछले 6 वर्षों में सैकड़ों करोड़ रुपये के उन विकासात्मक कार्यों से वंचित रह गया, जो उनका अधिकार था।
झारखंड के अनुसूचित जाति (SC) समाज को कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) और डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) के तहत मिलने वाले लाभों में भारी कमी का सामना करना पड़ा है। पिछले 6 वर्षों (2018-2024) के आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्टों (CAG, सरकारी डेटा) के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि SC समाज को उनके जनसंख्या अनुपात (लगभग 12%) के हिसाब से जो हिस्सा मिलना चाहिए था, वह उन्हें नहीं मिल सका है।
कुल फंड की उपलब्धता (CSR + DMF)
झारखंड में कंपनियों द्वारा खर्च किए जाने वाले CSR फंड और खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए बने DMF फंड का आकार बहुत बड़ा है।
- CSR फंड: पिछले 6 वर्षों में झारखंड में CSR के तहत अनुमानित 1,500 करोड़ से 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान रहा है।
- DMF फंड (महत्वपूर्ण): खनन प्रभावित जिलों (जहां SC आबादी भी बड़ी संख्या में है) के लिए DMF में करीब 13,700 करोड़ रुपये (2024 तक का अनुमान) जमा हुए हैं।
- कुल अनुमानित राशि: लगभग 15,000+ करोड़ रुपये का फंड उपलब्ध था जो सामाजिक विकास पर खर्च होना था।
SC समाज को कितना ‘नुकसान’ हुआ?
यदि हम SC आबादी (12%) को आधार मानें, तो पिछले 6 वर्षों में इस फंड का कम से कम 1,800 करोड़ रुपये (कुल 15,000 करोड़ का 12%) सीधे SC बस्तियों या उनके कल्याण पर खर्च होना चाहिए था। लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग है:
- अनुमानित ‘लॉस‘ (Benefits Not Received): विश्लेषण बताता है कि SC समाज को मिलने वाले संभावित लाभों में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमी रही है। यह राशि या तो खर्च ही नहीं हुई (Unspent) या सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर (General Infrastructure) में लगा दी गई जिससे SC बस्तियों को सीधा लाभ नहीं मिला।
फंड न मिल पाने के 3 प्रमुख कारण :
क. अनसुलझा फंड (Unspent Funds)
- रिपोर्ट्स के मुताबिक, DMF का एक बड़ा हिस्सा (कुछ जिलों में 40-50% तक) बिना खर्च के सरकारी खजाने में पड़ा है।
- खनन कंपनियों (जैसे CIL, Tata, आदि) के CSR फंड का भी एक हिस्सा ‘Unspent CSR Account’ में ट्रांसफर कर दिया जाता है, जिसका लाभ तुरंत ज़मीन पर नहीं दिखता।
ख . गलत दिशा में खर्च
- CAG की रिपोर्ट (ऑडिट) का खुलासा: धनबाद और बोकारो जैसे जिलों में (जहां SC आबादी ज्यादा है), करोड़ों रुपये बिना “प्रभावित लोगों की पहचान” किए खर्च कर दिए गए।
- नियमतः फंड का उपयोग प्रभावितों की आजीविका (Livelihood) और स्वास्थ्य पर होना चाहिए था, लेकिन पैसा बड़े शहरी प्रोजेक्ट्स, सड़कों, या सामान्य ‘ओपन जिम’ और ‘सौंदर्यीकरण’ में लगा दिया गया, जिसका सीधा फायदा गरीब SC परिवारों को नहीं मिला।
- एक उदाहरण: धनबाद में 1,164 प्रोजेक्ट्स में से केवल 1.86 करोड़ रुपये ही कौशल विकास (Skill Development) पर खर्च हुए, जो SC युवाओं के रोजगार के लिए सबसे जरूरी था।
ग . विशिष्ट योजनाओं का अभाव (Lack of Targeted Schemes)
- CSR और DMF में ‘SC सब–प्लान‘ जैसा कोई अनिवार्य नियम कड़ाई से लागू नहीं किया गया।
- कंपनियों ने शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च तो किया, लेकिन यह खर्च शहरों के बड़े स्कूलों या अस्पतालों पर ज्यादा हुआ, जबकि सुदूर गांवों की SC टोलियों में पीने का पानी और प्राथमिक स्कूलों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
क्या नहीं मिल सका?
पिछले 6 वर्षों में झारखंड के SC समाज को मुख्य रूप से इन चीजों से वंचित रहना पड़ा:
- कौशल विकास (Skill Development): SC युवाओं को रोजगारपरक ट्रेनिंग के लिए जो फंड मिलना चाहिए था, वह न के बराबर मिला।
- आजीविका के साधन: स्वरोजगार के लिए आर्थिक मदद (CSR लोन या ग्रांट) बहुत कम लोगों तक पहुंची।
- बस्ती विकास: SC बहुल गांवों में पक्का पानी और स्वच्छता का काम कागजों पर ज्यादा और जमीन पर कम हुआ।
सारांश: उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नीतिगत स्पष्टता की कमी और फंड के डायवर्जन (Diversion) के कारण झारखंड का SC समाज पिछले 6 वर्षों में सैकड़ों करोड़ रुपये के उन विकासात्मक कार्यों से वंचित रह गया, जो उनका अधिकार था।