झारखंड: “नदी बह रही है, पर खेत सूखे हैं। यह प्रकृति का दोष नहीं, यह उस किसान (सरकारों) का पाप है जिसने अपनी ही नहरों को मिट्टी से भर दिया है।”
झारखंड: एक ऐसा प्रदेश जिसकी कोख में खनिज है और हृदय में असीम संभावनाएं, किंतु जिसकी नसों में बहने वाला प्रशासनिक रक्त जैसे जम सा गया है। कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति मरुस्थल में प्यास से तड़प रहा है। अचानक उसे एक शीतल नदी के किनारे ला खड़ा किया जाता है, लेकिन विडंबना देखिए, उसके हाथ-पैर बांध दिए गए हैं ताकि वह जल को स्पर्श न कर सके। झारखंड में दलित और वंचित समाज की स्थिति आज ठीक वैसी ही है
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम (NSFDC) और झारखंड राज्य के बीच की यह स्थिति महज एक ‘फंड’ का मामला नहीं है। यह एक सभ्यतागत त्रासदी है, जहाँ प्यास बुझाने वाला सरोवर (NSFDC) लबालब भरा है, लेकिन प्यासे कंठ तक जल ले जाने वाली ‘अंजलि’ (राज्य निगम का बोर्ड) ही खंडित है।

सामाजिक आयाम: सपनों की भ्रूण हत्या (The Social Abortion of Dreams)
समाजशास्त्र की दृष्टि से देखें तो 4% से 6% की रियायती ब्याज दर केवल ‘आर्थिक मदद’ नहीं है; यह ‘गरिमा का उपकरण‘ (Tool of Dignity) है।
- सदीयों से हाशिए पर खड़े अनुसूचित जाति समाज के लिए यह धन वह सीढ़ी थी, जिससे वे ‘नौकरी मांगने वाले’ से ‘नौकरी देने वाले’ बन सकते थे।
- जब राज्य सरकार का तंत्र—अध्यक्ष और बोर्ड के अभाव में—इस धन को स्वीकार करने में असमर्थ हो जाता है, तो वह अनजाने में ही सामंतवाद के उस पुराने ढांचे को मजबूत कर रहा होता है, जहाँ गरीब को हमेशा साहूकार के 15-20% ब्याज वाले जाल में फड़फड़ाना पड़े।
- यह एक “संरचनात्मक हिंसा” (Structural Violence) है। जब आप किसी के पास उपलब्ध संसाधन पहुँचने ही नहीं देते, तो आप उसे गरीब बनाए रखने का सक्रिय षड्यंत्र रच रहे होते हैं।
संवैधानिक आयाम: ‘कल्याणकारी राज्य’ का विश्वासघात
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 46 स्पष्ट निर्देश देता है कि राज्य कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों के आर्थिक हितों को विशेष सावधानी से बढ़ावा देगा।
- झारखंड में निगम के पूर्णकालिक बोर्ड और अध्यक्ष का न होना, संविधान की इस भावना का संस्थागत उल्लंघन है।
- यह ‘लोकतंत्र के सामाजिक अनुबंध’ (Social Contract) का टूटना है। जब नागरिक वोट देता है, तो वह एक ‘सेतु’ की उम्मीद करता है जो उसे दिल्ली के संसाधनों से जोड़े। यहाँ वह सेतु टूटा हुआ है।
- फंड का ‘सरेंडर’ किया जाना एक प्रशासनिक शब्द हो सकता है, लेकिन संवैधानिक दृष्टि से यह “कर्तव्य का परित्याग” (Abdication of Duty) है। यह ऐसा ही है जैसे कोई डॉक्टर दवा उपलब्ध होने के बावजूद मरीज को इसलिए मरने दे क्योंकि उसके पास प्रिस्क्रिप्शन लिखने वाला पेन नहीं है।
राजनीतिक आयाम: इच्छाशक्ति का लकवा (Paralysis of Political Will)
राजनीति का अर्थ केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि ‘वितरण न्याय’ (Distributive Justice) सुनिश्चित करना है।
- बोर्ड और अध्यक्ष के पद खाली रहना यह दर्शाता है कि राज्य के राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह निगम प्राथमिकता में ही नहीं है। यह “राजनीतिक उदासीनता“ का चरम है।
- जब केंद्र से मिलने वाला करोड़ों का फंड वापस लौटता है, तो वह केवल पैसा वापस नहीं जाता; वह राज्य की ‘बार्गेनिंग पावर‘ (तोल-मोल की शक्ति) को भी साथ ले जाता है। केंद्र अगली बार पूछेगा—“जब पिछला दिया हुआ निवाला आप निगल नहीं पाए, तो और क्यों दें?”
- यह राज्य के आर्थिक हितों के साथ खिलवाड़ ही नहीं, बल्कि एक “आत्मघाती राजनीति“ है। आप अपने ही नागरिकों को सशक्त करने वाले हथियारों (संसाधनों) को युद्ध के मैदान में सरेंडर कर रहे हैं।
दार्शनिक पहलू: मूक दर्शक बना तंत्र
अंततः, यह पूरी स्थिति एक गहरे नैतिक संकट की ओर इशारा करती है। “नदी बह रही है, पर खेत सूखे हैं। यह प्रकृति का दोष नहीं, यह उस किसान (सरकार) का पाप है जिसने अपनी ही नहरों को मिट्टी से भर दिया है।” वित्तीय वर्ष के अंत में फंड का सरेंडर होना उन हजारों युवाओं की उम्मीदों का सरेंडर है जो अपनी छोटी सी दुकान, अपना छोटा सा स्टार्टअप खड़ा करना चाहते थे। यह वह पैसा था जो किसी के घर का राशन, किसी बच्चे की स्कूल फीस और किसी बुजुर्ग की दवाई बन सकता था।
इस निष्क्रियता को तोड़ना होगा। ‘सेतु’ का निर्माण केवल ईंट-गारे (यानी फाइलों और नियुक्तियों) का काम नहीं है, यह संवेदनाओं के पुनर्स्थापना का कार्य है। यदि यह जल्द नहीं किया गया, तो इतिहास लिखेगा कि झारखंड एक ऐसा राज्य था जो संसाधनों की भूख से नहीं, बल्कि प्रबंधन के अपच से मरा था।