झारखंड: SC आयोग की अनदेखी केवल ‘प्रशासनिक मुद्दा’ नहीं एक ‘आर्थिक आपातकाल’

झारखंड में अनुसूचित जाति आयोग की उपेक्षा मात्र एक ‘प्रशासनिक विषय’ न होकर, यह समाज के लिए एक ‘आर्थिक आपातकाल’ के समान है। इसका तात्पर्य यह है कि इससे एक पूरी पीढ़ी के विकास के अवसर बाधित हो रहे हैं।

रांची: झारखंड में अनुसूचित जाति (SC) आयोग के निष्क्रिय रहने या कमजोर होने से समाज को होने वाली आर्थिक हानि का कोई एक ‘सीधा सरकारी आंकड़ा’ उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि सरकारें अक्सर अपनी विफलताओं का दस्तावेज नहीं बनातीं।

​हालाँकि, CAG (कैग), NCRB (एनसीआरबी) और बजट प्रावधानों के विश्लेषण के आधार पर हम इस ‘अदृश्य आर्थिक हानि’ का स्पष्ट आकलन कर सकते हैं। आयोग की अनदेखी से समाज को मुख्य रूप से 4 मोर्चों पर भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण :

आर्थिक आपातकाल

SC सब-प्लान (SCSP) बजट का लैप्स होना (सबसे बड़ी आर्थिक हानि)

​नियम के अनुसार, राज्य के बजट का एक हिस्सा (जनसंख्या के अनुपात में, लगभग 12-13%) विशेष रूप से SC विकास के लिए खर्च होना चाहिए। आयोग का काम इसकी निगरानी करना है। आयोग के निष्क्रिय रहने पर यह पैसा या तो खर्च नहीं होता या दूसरी जगह डायवर्ट कर दिया जाता है।

  • आंकड़े (अनुमानित): झारखंड के पिछले कुछ वर्षों के बजट का विश्लेषण करें तो प्रति वर्ष SC सब-प्लान के तहत आवंटित राशि में से सैकड़ों करोड़ रुपये बिना खर्च हुए सरकारी खजाने में वापस (Surrender) चले जाते हैं।
  • हानि: यदि एक वित्तीय वर्ष में 500-1000 करोड़ रुपये भी ‘अन-उपयोग’ (Unspent) रह गए, तो यह सीधा SC समाज के विकास (सड़क, बिजली, आवास) का आर्थिक नुकसान है।
आर्थिक आपातकाल

अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) के तहत मुआवजे में देरी

​SC/ST एक्ट के तहत पीड़ित परिवार को FIR दर्ज होने और चार्जशीट दाखिल होने पर 85,000 रुपये से लेकर 8.25 लाख रुपये तक (अपराध की गंभीरता के अनुसार) तत्काल आर्थिक सहायता का प्रावधान है।

  • आयोग की भूमिका: जब पुलिस केस दर्ज नहीं करती या मुआवजा रोकती है, तो आयोग ही नोटिस भेजकर भुगतान करवाता है।
  • आंकड़े: NCRB (2022-23) के अनुसार, झारखंड में SC समाज के खिलाफ अपराध के मामले बढ़े हैं, लेकिन ‘पेंडेंसी रेट’ (लंबित मामले) भी बहुत अधिक है।
  • हानि: यदि राज्य में 1,000 मामले भी पेंडिंग हैं और औसत मुआवजा 2 लाख रुपये माना जाए, तो लगभग 20 करोड़ रुपये की सीधी आर्थिक सहायता समाज के पीड़ित परिवारों तक नहीं पहुँच पा रही है।

बैकलॉग रिक्तियां (नौकरियों में आर्थिक हानि)

​आयोग का एक मुख्य कार्य सरकारी नौकरियों में ‘रोस्टर’ (Roster) की जांच करना है। आयोग की अनदेखी के कारण बैकलॉग (Backlog) की भर्तियां सालों तक नहीं निकलतीं।

  • वास्तविक स्थिति: झारखंड में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) में SC कोटे की हजारों सीटें खाली रह जाती हैं।
  • हानि का गणित: मान लीजिए अगर 500 सरकारी पद (ग्रुप C और D) भी बैकलॉग में पड़े हैं और औसत वेतन 40,000 रुपये है।
    • ​500 x 40,000 x 12 = 24
    • ​यह 24 करोड़ रुपये समाज के युवाओं की जेब में जाने चाहिए थे, जो आयोग की सुस्ती के कारण नहीं जा पा रहे।

छात्रवृत्ति और कल्याणकारी योजनाएं (ई-कल्याण)

​पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप में देरी झारखंड में एक आम समस्या है। समय पर पैसा न मिलने से छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं, जिससे उनकी भविष्य की ‘आय क्षमता’ (Earning Capacity) खत्म हो जाती है।

  • आंकड़े: सीएजी (CAG) की रिपोर्ट्स अक्सर कल्याण विभाग द्वारा ‘उपयोग प्रमाण पत्र’ (Utilization Certificates) जमा न करने और फंड के दुरुपयोग की ओर इशारा करती हैं।
  • हानि: यह नुकसान करोड़ों में है क्योंकि हजारों छात्र उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।

कुल अनुमानित आर्थिक प्रभाव

झारखंड में अनुसूचित जाति आयोग की उपेक्षा मात्र एक ‘प्रशासनिक विषय’ न होकर, यह समाज के लिए एक ‘आर्थिक आपातकाल’ के समान है। जब हम इसे ‘आर्थिक आपातकाल’ की संज्ञा देते हैं, तो इसका तात्पर्य यह है कि इससे एक पूरी पीढ़ी के विकास के अवसर बाधित हो रहे हैं।

संवैधानिक संस्थाओं की अनुपस्थिति अथवा उनकी निष्क्रियता का सीधा प्रभाव व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, पोषण और भविष्य पर पड़ता है। आयोग के अभाव में सरकार पर आवश्यक ‘दबाव समूह’ की भूमिका समाप्त हो जाती है, जिसका सीधा असर समाज की आर्थिक संरचना पर परिलक्षित होता है।

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