​झारखंड: पहचान का द्वंद्व और अनुसूचित जाति का विस्थापन

झारखंड के बौद्धिक विमर्श में ‘आदिवासी’ और ‘मूलवासी’ की श्रेणियों ने जहाँ एक ओर स्थानीय अधिकारों की चेतना जगाई है, वहीं दूसरी ओर अनुसूचित समाज को एक ‘अदृश्य हाशिये’ पर धकेल दिया है।

​रांची: झारखंड की राजनीति और समाजशास्त्र वर्तमान में एक ऐसे वैचारिक भंवर में फंसा है, जहाँ ‘स्वदेशीपन’ (Indigeneity) की परिभाषाएं इतनी संकुचित हो गई हैं कि वे समावेशी होने के बजाय निष्कासक (Exclusive) होती जा रही हैं। इस विमर्श में अनुसूचित जाति की स्थिति उस ‘ऐतिहासिक विस्मृति’ जैसी है, जिसे राज्य के मूल ढांचे का हिस्सा तो माना जाता है, पर हकदारी के समय ‘बाहरी’ का ठप्पा लगा दिया जाता है।

पहचान का द्वंद्व

​’दीकु’ का भ्रामक विस्तार और ऐतिहासिक अन्याय

​ऐतिहासिक रूप से ‘दीकु’ शब्द का प्रयोग उन शोषक बाहरी तत्वों (जमींदार, साहूकार) के लिए किया गया था जिन्होंने यहाँ की जल-जंगल-जमीन का दोहन किया। किंतु, आधुनिक बौद्धिक विमर्श में इस शब्द का विस्तार अनजाने में (या जानबूझकर) अनुसूचित जातियों तक कर दिया गया है।

यह विस्थापन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक है। सदियों से यहाँ की कृषि अर्थव्यवस्था, शिल्प और ग्रामीण तंत्र को मजबूती देने वाला SC समाज अचानक स्वयं को अपनी ही मिट्टी पर ‘प्रवासी’ की नजरों से देखे जाने पर विवश है।

​’स्वदेशीपन’ का मायाजाल और जातिगत सत्य का दमन

​गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और मध्यमवर्गीय बौद्धिक समूहों ने ‘इंडिजीनिटी’ (Indigeneity) को एक वैश्विक फैशन की तरह अपनाया है। यह विमर्श आदिवासी पहचान को तो वैश्विक मंच पर स्थापित करता है, लेकिन जातिआधारित पदानुक्रम और अस्पृश्यता के कड़वे यथार्थ को कालीन के नीचे दबा देता है।

  • हानि: जब हम केवल ‘स्वदेशी’ अधिकारों की बात करते हैं, तो हम उस सामाजिक ऊंच-नीच को नजरअंदाज कर देते हैं जो उसी समाज के भीतर मौजूद है। इससे SC समाज की वे विशिष्ट समस्याएं -जैसे भूमिहीनता और सामाजिक बहिष्कार—गौण हो जाती हैं जिन्हें ‘मूलवासी’ का व्यापक लेबल हल नहीं कर पाता।

​मनोवैज्ञानिक पतन: ‘मालिक’ से ‘लाभार्थी’ तक की यात्रा

​इस विमर्श का सबसे आत्मघाती पहलू वह हीन भावना है जो SC समाज के भीतर घर कर रही है। जब किसी समुदाय को निरंतर यह अहसास कराया जाता है कि राज्य का ‘मूल स्वामित्व’ उसका नहीं है, तो उसकी राजनीतिक और सामाजिक महत्वाकांक्षा दम तोड़ने लगती है।

  • संकट: वे स्वयं को राज्य के ‘सह-निर्माता’ या ‘स्वामी’ के बजाय केवल सरकार द्वारा दी जाने वाली योजनाओं, राशन और आरक्षण के ‘पात्र लाभार्थी’ (Beneficiaries) के रूप में देखने लगते हैं। यह ‘याचक मानसिकता’ किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए घातक है।

राज्य और समाज की सामूहिक क्षति

​एक विभाजित समाज कभी भी एक मजबूत राज्य का निर्माण नहीं कर सकता। अनुसूचित जाति को हाशिये पर रखने से राज्य को निम्नलिखित क्षतियां हो रही हैं:

  • सामाजिक विखंडन: दलित और आदिवासी समुदायों के बीच एक कृत्रिम दूरी पैदा होती है, जो अंततः उन शक्तियों को मजबूत करती है जो झारखंड की स्वायत्तता के विरोधी हैं।
  • बौद्धिक दरिद्रता: जब समाज का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 12-14%) अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा हो, तो राज्य का सांस्कृतिक और बौद्धिक विकास एकांगी रह जाता है।

​एक समावेशी विकल्प की आवश्यकता

​झारखंड के भविष्य के लिए यह अनिवार्य है कि ‘झारखंडी’ पहचान का पुनर्गठन किया जाए। हमें एक ऐसे विमर्श की आवश्यकता है जहाँ:

  1. श्रम की संस्कृति को ‘स्वामित्व’ का आधार माना जाए, न कि केवल वंशानुगत पहचान को।
  2. जातिउन्मूलन को स्वदेशी अधिकारों के बराबर महत्व दिया जाए।
  3. ​अनुसूचित जाति को ‘बाहरी’ मानने के ऐतिहासिक भ्रम को तोड़कर उन्हें राज्य का समान साझीदार स्वीकार किया जाए।

​झारखंड की पहचान तभी पूर्ण होगी जब आदिवासी, मूलवासी और दलित -तीनों मिलकर इस मिट्टी पर अपना ‘साझा दावा’ पेश करेंगे, न कि एक-दूसरे को ‘दीकु’ की श्रेणी में रखकर।

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