झारखंड: SC समाज को ​आत्म-शक्ति उदय पर काम करना चाहिए

आर्थिक बहिष्कार एक मरुस्थल की तरह है। मरुस्थल में वही पौधा जीवित रहता है जिसकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं। इस समुदाय को अपनी ‘जड़ें’ अपनी संस्कृति, एकता और अदम्य साहस में गहरी करनी होंगी।

झारखंड के दलित समुदाय के लिए आर्थिक बहिष्कार केवल संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि यह उनकी पहचान और अस्तित्व पर एक गंभीर आघात है। इस विकट परिस्थिति से उबरने के लिए, इस समुदाय को ‘प्रतिरोध’ को ‘परिवर्तन’ में रूपांतरित करने की आवश्यकता है।

झारखंड में दलित समुदाय का आर्थिक बहिष्कार केवल एक सामाजिक त्रासदी नहीं, बल्कि मानवता पर एक गहरा आघात है। जब समाज रोजगार, व्यापार अथवा वित्तीय लेन-देन के अवसर अवरुद्ध कर देता है, तो यह स्थिति “आर्थिक हिंसा” के समान है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में, जब भी किसी समुदाय को हाशिए पर धकेला गया है, उसने अपनी आंतरिक शक्ति से ही एक नवीन भविष्य का निर्माण किया है।

आत्म-शक्ति उदय

आर्थिक घेराबंदी से स्वावलंबन तक

आर्थिक बहिष्कार एक ऐसी अदृश्य बाधा है जो मानवीय गरिमा को खंडित करने का प्रयास करती है। झारखंड के परिप्रेक्ष्य में, जहाँ जल, जंगल, ज़मीन और श्रम ही जीवन का आधार हैं, वहाँ दलित समुदाय को आर्थिक रूप से पृथक करना उन्हें उनकी जड़ों से विच्छेद करने के समान है। तथापि, इतिहास इस बात का साक्षी है कि सर्वाधिक कठोर आघात ही सर्वाधिक सुदृढ़ संकल्पों को जन्म देते हैं। इस बहिष्कार का प्रत्युत्तर ‘निवेदन’ नहीं, अपितु ‘आत्मनिर्भरता’ है।

अपनी समानांतर अर्थव्यवस्थाका निर्माण

बहिष्कार का सामना ‘अनुरोध’ से नहीं, बल्कि ‘विकल्प’ से किया जाता है। यदि कोई बाज़ार आपके लिए अवसर बंद कर देता है, तो समुदाय को अपनी आंतरिक शक्ति के माध्यम से एक समानांतर बाज़ार स्थापित करना होगा।

  • सामुदायिक साख (Community Credit): स्थानीय साहूकारों के जाल से बाहर निकलने के लिए ‘स्वयं सहायता समूह’ (SHG) को बैंक की तरह उपयोग करना चाहिए। जब पूंजी अपनी होगी, तो व्यापार की शर्तें भी अपनी होंगी।
  • उत्पादन की सामूहिक ताकत: व्यक्तिगत खेती या श्रम के बजाय, ‘सहकारी समिति’ (Cooperatives) बनाकर उत्पादन करें। जब आप थोक में उत्पादन करेंगे, तो बिचौलिए इस समुदाय की उपेक्षा नहीं कर पाएंगे।

शिक्षा और डिजिटल सेतु (Digital Bridge)

​भौगोलिक और सामाजिक दूरियों को मिटाने का सबसे शक्तिशाली शस्त्र ‘इंटरनेट’ है। डिजिटल साक्षरता दलित युवाओं को स्थानीय बहिष्कार की सीमाओं से बाहर निकाल सकती है।

  • कॉमर्स और डायरेक्ट मार्केटिंग: अपने हस्तशिल्प, कृषि उत्पाद या वनोपज को सीधे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचें। डिजिटल बाजार में ग्राहक जाति नहीं, आपके उत्पाद की गुणवत्ता देखता है।
  • कौशल का विविधीकरण: पारंपरिक व्यवसायों से हटकर तकनीकी क्षेत्रों (जैसे कोडिंग, डेटा एंट्री, लॉजिस्टिक्स) में प्रवेश करें, जहाँ योग्यता ही एकमात्र पैमाना है।

सामाजिक एकजुटता: ‘हमकी भावना

​बहिष्कार तब सफल होता है जब वह व्यक्ति को अकेला कर देता है। सामूहिक एकजुटता इस अस्त्र को कुंद कर देती है।

  • अधिकारों के प्रति सजगता: संवैधानिक अधिकारों और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए बनी विशेष योजनाओं (जैसे स्टैंड-अप इंडिया, मुद्रा लोन) का लाभ उठाएं।
  • आंतरिक व्यापार: समुदाय के भीतर एक-दूसरे के व्यवसायों का समर्थन करें। जब समुदाय का पैसा समुदाय के भीतर ही घूमता है, तो वह सामूहिक समृद्धि का आधार बनता है।

मरुस्थल में हरियाली का संकल्प

​आर्थिक बहिष्कार एक मरुस्थल की तरह है—शुष्क और कठोर। लेकिन मरुस्थल में भी वही पौधा जीवित रहता है जिसकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं। इस समुदाय को अपनी ‘जड़ें’ अपनी संस्कृति, एकता और अदम्य साहस में गहरी करनी होंगी।

​”बाहरी दुनिया यदि आपको हाथ लगाने से मना करती है, तो अपने हाथों को इतना सक्षम बना लें कि दुनिया आपकी सेवा और आपके उत्पाद के लिए कतार में खड़ी हो जाए।”

निष्कर्ष: बहिष्कार आपको कमजोर करने के लिए किया गया है, लेकिन आप इसे अपनी आत्मनिर्भरता की नींव बना लें। जिस दिन आप ‘मजदूर’ से ‘मालिक’ और ‘याचक’ से ‘प्रदाता’ बनेंगे, उसी दिन यह आर्थिक घेराबंदी स्वतः ध्वस्त हो जाएगी। बहिष्कार का सबसे बड़ा प्रतिशोध अपनी आर्थिक तरक्की है। एकजुट होइए, अपने संसाधन खुद पैदा कीजिये और अपनी शर्तों पर बाज़ार खड़ा कीजिये।

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