समान अवसर का स्वप्न और यथार्थ: GSCC के आईने में SC समाज

​समानता का युद्ध केवल धन से नहीं, सूचना और आत्मविश्वास से भी लड़ा जाता है। उच्च वर्गों के पास सूचनाओं का सुदृढ़ तंत्र और ‘मार्गदर्शन’ की विरासत है, वहीं SC समाज के अधिकांश युवा प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं।

रांची: शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण के इस युग में, जहाँ ज्ञान को अब साधना के बजाय एक क्रय योग्य वस्तु के रूप में देखा जाता है, झारखंड सरकार की ‘गुरुजी स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड’ (GSCC) जैसी पहलें गहन अंधकार में एक आशा की किरण के समान हैं। इस योजना का मूल सिद्धांत ‘समान अवसर’ है—यह इस विश्वास पर आधारित है कि किसी छात्र की आर्थिक स्थिति चाहे जैसी भी हो, उसकी प्रतिभा को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।
परंतु, क्या इस आदर्शवादी दृष्टिकोण का लाभ अनुसूचित जाति (SC) समुदाय तक पूरी तरह से पहुँच पाया है? जमीनी हकीकत इसके विपरीत है। नीतियों के नेक इरादों और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच आज भी एक महत्वपूर्ण खाई बनी हुई है।

GSCC के आईने में

​इस अपूर्णता और विडंबना का तुलनात्मक और गहन विश्लेषण :

​सरकारी ‘गारंटी’ बनाम व्यवस्थागत ‘जड़ता’: एक अंतहीन द्वंद्व

​यद्यपि सत्ता ऋण की ‘संप्रभु गारंटी’ (Sovereign Guarantee) देती है, तथापि बैंकिंग तंत्र आज भी ‘साख’ (Creditworthiness) के उसी पुरातन और सामंती सिद्धांत पर संचालित है। SC समाज का एक विशाल वर्ग ऐतिहासिक रूप से ‘संपत्ति-विहीन’ रहा है। विडंबना यह है कि बैंक अधिकारी अक्सर अवचेतन पूर्वाग्रह‘ (Unconscious Bias) से ग्रसित होते हैं; उनकी दृष्टि में सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि का छात्र एक ‘संभावित चूककर्ता’ (Defaulter) है, न कि ‘भविष्य का निर्माता’। परिणामतः, सरकारी गारंटी के बावजूद, फाइलों को लालफीताशाही और प्रक्रियागत भूलभुलैया में जानबूझकर उलझा दिया जाता है।

​’सामाजिक पूंजी’ (Social Capital) की रिक्तता और प्रथम पीढ़ी का संघर्ष

​समानता का युद्ध केवल धन से नहीं, सूचना और आत्मविश्वास से भी लड़ा जाता है। जहाँ उच्च वर्गों के पास सूचनाओं का सुदृढ़ तंत्र और ‘मार्गदर्शन’ (Mentorship) की विरासत है, वहीं SC समाज के अधिकांश युवा प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी‘ (First Generation Learners) हैं। उनके पास बैंकिंग की जटिल शब्दावली, कागजी कार्रवाई के मकड़जाल और तकनीकी बाधाओं को भेदने के लिए न तो पारिवारिक अनुभव है, न ही सामाजिक सहयोग (Social Capital)। एक संपन्न छात्र बैंक प्रबंधक की आँखों में आँखें डालकर अपने ‘अधिकार’ की बात करता है, जबकि सदियों से वंचित छात्र ‘संकोच और भय’ के कुहासे में अपना न्यायसंगत पक्ष भी नहीं रख पाता।

​शिक्षा का ‘बाजार’ और अस्तित्व का संकट

​शिक्षा के व्यावसायीकरण ने डिग्रियां तो सुलभ कर दी हैं, किंतु रोजगार की सुरक्षा छीन ली है। एक साधनहीन SC परिवार के लिए 10-15 लाख का ऋण केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि जीवन और मरण का प्रश्न है। यह उनके लिए ‘अवसर’ कम और गले का फंदा अधिक प्रतीत होता है। भय यह है कि यदि डिग्री के पश्चात नौकरी न मिली, तो यह ऋण उनकी आने वाली पीढ़ियों को भी गिरवी रख देगा। यह ‘मनोवैज्ञानिक दबाव’ उन्हें इस योजना का लाभ उठाने से रोकता है, जबकि संपन्न वर्ग इसे महज एक ‘निवेश’ मानकर जोखिम उठाने का साहस कर लेता है।

​बैंकिंग समावेशन: वित्तीय पूंजी से सामाजिक न्याय की ओर

​भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के शीर्ष पदों पर विविधता का अभाव केवल एक प्रशासनिक रिक्ति नहीं, बल्कि एक संस्थागत अवरोध है। इस चुनौती का निवारण तीन आयामों में आवश्यक है:

  • प्रतिनिधित्व और संवेदना: जब नीति-निर्माण के स्तर पर वंचित वर्गों की अनुपस्थिति होती है, तो नीतियां ‘यांत्रिक’ होकर रह जाती हैं। मानवीय करुणा और संवेदना के बिना बैंक केवल ‘साहूकार’ रह जाते हैं, सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत नहीं बन पाते।
  • वित्तीय बनाम मनोवैज्ञानिक बाधा: GSCC जैसी योजनाएं जेब की ‘पूंजी’ तो दे सकती हैं, लेकिन बैंक की चौखट पर महसूस होने वाली सामाजिक असुरक्षा का उपचार नहीं कर सकतीं। आर्थिक सहायता तब तक निरर्थक है, जब तक बैंक का वातावरण स्वागतयोग्य, भयमुक्त और भेदभाव-रहित न हो।
  • साक्षरता का कवच: ‘समान अवसर’ का सिद्धांत धरातल पर तभी उतर सकेगा, जब वंचित वर्गों के हाथों में ‘वित्तीय साक्षरता’ का शस्त्र हो और बैंकिंग तंत्र में उनका अपना ‘प्रतिनिधित्व’।

निष्कर्षतः, बैंकिंग प्रणाली को अपनी सफेदपोश उदासीनता का त्याग करना होगा। सच्चा वित्तीय समावेशन केवल ‘खाता खोलने’ या ‘ऋण स्वीकृत’ करने तक सीमित नहीं है, अपितु यह हाशिए पर खड़े अंतिम व्यक्ति को वित्तीय गरिमा और अधिकार के साथ समाज की मुख्यधारा में खड़ा करने का अनुष्ठान है

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