झारखंड: दावोस यात्रा -आकाश की ऊँचाई और ज़मीन की सच्चाई

झारखंड : सरकार को यह समझना होगा कि ‘आदिवासी अस्मिता’ का सम्मान जरूरी है, लेकिन ‘दलित गरिमा’ की उपेक्षा कर राज्य पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता।”

झारखंड के 25वें वर्ष के इस ऐतिहासिक मोड़ पर, जहाँ एक तरफ दावोस और ऑक्सफोर्ड की उपलब्धियाँ हैं, वहीं दूसरी तरफ SC (अनुसूचित जाति) समाज के भविष्य की चिंता—यह द्वंद्व एक गहरे चिंतन की मांग करता है।

निसंदेह, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और मंत्री सुदिव्य कुमार की यह पहल (यूके/दावोस यात्रा) झारखंड की ‘आदिवासी अस्मिता’ को ‘दया के पात्र’ से बदलकर ‘शक्ति के प्रतीक’ के रूप में स्थापित कर रही है। ‘मरांग गोमके’ छात्रवृत्ति ने यह साबित किया है कि प्रतिभा को अगर पंख मिलें, तो वह अभावों का आकाश चीर सकती है। यह राज्य के लिए गौरव का क्षण है।

दलित गरिमा की उपेक्षा
दलित गरिमा की उपेक्षा

SC समाज की ‘मौन पीड़ा’ (गंभीर प्रश्न):

सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि झारखंड, जो मूल रूप से आदिवासी बाहुल्य और केंद्रित राज्य है, वहां दलित (SC) समाज अक्सर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में ‘अदृश्य’ महसूस करता है।

  • तथ्यात्मक दृष्टि: यद्यपि ‘मरांग गोमके’ योजना का विस्तार अब SC, OBC और अल्पसंख्यकों के लिए भी किया गया है, लेकिन इसका नैरेटिव और मुख्य फोकस अभी भी अत्यधिक आदिवासी-केंद्रित है।
  • भावनात्मक शून्यता: जब सरकार की ‘प्राथमिकता सूची’ में SC समाज खुद को हाशिये पर पाता है, तो उसे लगता है कि विकास की इस दौड़ में वह सहभागी नहीं, बल्कि केवल एक दर्शक है।

संवैधानिक मानदंड का परिप्रेक्ष्य:

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 46 राज्य को निर्देश देता है कि वह SC और ST दोनों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को विशेष सावधानी से बढ़ावा दे।

  • संतुलन का अभाव: एक सच्चे कल्याणकारी राज्य की कसौटी यह है कि न्याय समावेशी हो। यदि राज्य की पहचान केवल एक समुदाय के उत्थान तक सिमट जाए, तो यह समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) की भावना के साथ अधूरा न्याय होगा।
  • अंत्योदय की कमी: दलित समाज, जो सामाजिक संरचना में सबसे निचले पायदान पर संघर्षरत है, उसे केवल ‘योजनाओं में नाम’ नहीं, बल्कि ‘नेतृत्व में भागीदारी’ और ‘विशेष संरक्षण’ की दरकार है।

मजबूत झारखंड के लिए दोनों पैरों का सशक्त होना अनिवार्य

​”विकास की रोशनी यदि घर के आँगन (ST) को रोशन करे, लेकिन घर की देहरी (SC) अंधेरे में रह जाए, तो वह ‘सूर्य’ नहीं, मात्र एक ‘दीपक’ है। झारखंड की सार्थकता तभी है जब ‘मरांग गोमके’ की भावना केवल एक समुदाय तक सीमित न रहकर, बाबा साहेब के ‘प्रबुद्ध भारत’ के सपने को भी साथ लेकर चले। SC समाज का भविष्य असुरक्षित नहीं होना चाहिए, क्योंकि मजबूत झारखंड के लिए दोनों पैरों (ST और SC) का सशक्त होना अनिवार्य है।

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