योग्यता का भ्रम और वर्चस्व की विरासत: यूजीसी 2026 -व्याख्या

सवर्ण विरोध तब तक उचित नहीं माना जा सकता जब तक वे अपने एकाधिकार को त्यागकर ‘ज्ञान के लोकतंत्रीकरण’ हेतु स्थान बनाने के लिए तत्पर न हों।

रांची: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 2026 में अधिसूचित “उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता का संवर्द्धन विनियम” मात्र एक प्रशासनिक दस्तावेज़ नहीं है, अपितु यह भारतीय अकादमिक परिदृश्य में उन अवरोधों को दूर करने का एक प्रयास है, जिन्हें दशकों से योग्यता के मानदंड के आधार पर बनाए रखा गया है।

योग्यता का भ्रम और वर्चस्व की विरासत : यूजीसी 2026
योग्यता का भ्रम और वर्चस्व की विरासत : यूजीसी 2026

इस विषय को एक गहन सामाजिक परिप्रेक्ष्य में निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

वर्चस्व का भूगोल और ‘ज्ञान की शुद्धता’ का मिथक

शिक्षण संस्थानों में लगभग 90% सवर्णों का प्रभुत्व मात्र एक संयोग नहीं है, बल्कि यह संस्थागत नेटवर्किंग और सांस्कृतिक पूंजी का परिणाम है। जब विरोधी पक्ष यह तर्क देता है कि “समानता के नियमों से गुणवत्ता में गिरावट आएगी”, तो वे अनजाने में यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि योग्यता केवल एक विशिष्ट जातिगत समूह का विशेषाधिकार है।

  • अर्थ: विश्वविद्यालय मात्र उपाधि प्रदान करने वाले संस्थान नहीं हैं, अपितु वे ‘विचारों की प्रयोगशाला’ के रूप में कार्य करते हैं। यदि इस प्रयोगशाला में कार्यरत सभी वैज्ञानिक समान पृष्ठभूमि और समान सामाजिक चेतना से संबंधित होंगे, तो उनसे उत्पन्न ‘ज्ञान’ कभी भी सार्वभौमिक नहीं हो सकता। वह केवल एक विशिष्ट वर्ग के ‘दृष्टिकोण’ का प्रतिनिधित्व करेगा।

​सवर्ण विरोध: असुरक्षा या विशेषाधिकार का मोह?

सवर्ण समाज का विरोध अक्सर ‘प्रतिभा के पलायन’ या ‘अन्याय’ के तर्क पर आधारित होता है। हालांकि, जब आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs), भारतीय विज्ञान संस्थानों (IISc) और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के उच्च पदों पर आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व आज भी नगण्य है, तो यह विरोध ‘न्याय’ की मांग के बजाय ‘आधिपत्य’ को बनाए रखने की एक छटपटाहट प्रतीत होती है।

  • सामाजिक विश्लेषण के परिप्रेक्ष्य में, समाजशास्त्र इसे ‘विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की नाजुकता’ के रूप में संदर्भित करता है। जब कोई वर्ग ऐतिहासिक रूप से अग्रणी स्थिति में रहा हो, तो उसे ‘समानता की पंक्ति’ में वापस लाना ‘उत्पीड़न’ के रूप में अनुभव हो सकता है।

​UGC 2026 के नियम: एक संरचनात्मक उपचार

2026 के नए नियमों के अंतर्गत ‘समान अवसर केंद्र’ और ‘भेदभाव-विरोधी समिति’ का गठन अनिवार्य किया गया है। इस प्रावधान के संबंध में मुख्य आपत्ति यह है कि इससे ‘मिथ्या प्रकरणों’ की संख्या में वृद्धि हो सकती है।

  • यह व्याख्या कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा हेतु निर्मित ‘POSH’ नियमों के संदर्भ में प्रस्तुत तर्क के समान है। वास्तविकता यह है कि जब सत्ता संरचना एकतरफा होती है, तो वहां ‘सूक्ष्म भेदभाव’ इतनी गहराई तक व्याप्त होते हैं कि उन्हें कठोर नियमों के अभाव में पहचानना असंभव हो जाता है। 90% प्रभावी वर्ग के समक्ष 10% वंचित वर्ग के व्यक्ति का मानसिक संघर्ष एक ‘मौन युद्ध’ के समान होता है।

​योग्यता (Merit) की एक नई परिभाषा

विरोध प्रदर्शनों को उचित ठहराने के लिए अक्सर ‘योग्यता’ का तर्क दिया जाता है। हालाँकि, सामाजिक न्याय का मूल सिद्धांत यह है कि:

“योग्यता केवल प्राप्त अंकों का कुल योग नहीं है, बल्कि इसमें उन चुनौतियों का भी समावेश है जिन्हें पार करके कोई व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति तक पहुँचा है।”

एक ऐसे छात्र की तुलना करना, जिसके पास पाँच पीढ़ियों से पुस्तकालय का उपयोग करने का विशेषाधिकार रहा है, उस छात्र से, जो अपने परिवार में शिक्षा प्राप्त करने वाला प्रथम सदस्य है, अपने आप में एक महत्वपूर्ण असमानता प्रस्तुत करता है।

क्या यह सवर्ण विरोध जायज है?

यदि हम इस विषय को सांख्यिकीय दृष्टिकोण से देखें, तो यह विरोध पूर्णतः निराधार प्रतीत होता है। जब देश की 80% से अधिक जनसंख्या (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग) का प्रतिनिधित्व उच्च पदों पर 10-15% भी नहीं है, तो समानता के नियमों को ‘सवर्णों के विरुद्ध’ बताना एक ऐतिहासिक त्रुटि है।

एक राष्ट्र तभी ‘शिक्षित’ कहलाता है जब उसके विश्वविद्यालय समाज का लघु-रूप प्रस्तुत करें। सवर्ण विरोध तब तक उचित नहीं माना जा सकता जब तक वे अपने एकाधिकार को त्यागकर ‘ज्ञान के लोकतंत्रीकरण’ हेतु स्थान बनाने के लिए तत्पर न हों। यह नियम सवर्णों के विरुद्ध नहीं, अपितु भारतीय अकादमिक जगत की आत्मा को शुद्ध करने के लिए है।

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