झारखंड: SC आरक्षण का सामाजिक न्याय का संकुचित क्षितिज

झारखण्ड के प्रशासनिक ढांचे में अनुसूचित जाति (SC) का प्रतिनिधित्व एक दुरूह वैधानिक पहेली बन गया है। राज्य का वर्तमान आरक्षण मॉडल एक गंभीर विसंगति को दर्शाता है।

…विजय विद्रोही

रांची: झारखंड की स्थापना भाषाई और सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण के संकल्प के साथ हुई थी, किंतु राज्य के प्रशासनिक ढांचे में अनुसूचित जाति (SC) का प्रतिनिधित्व एक दुरूह वैधानिक पहेली बन गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के मूल दर्शन—’समानता के भीतर न्याय’—की कसौटी पर झारखंड का वर्तमान आरक्षण मॉडल एक गंभीर विसंगति को दर्शाता है।

झारखंड SC आरक्षण

ऐतिहासिक विस्थापन: 14% से 10% का सफर

झारखंड का गठन एकीकृत बिहार की कोख से हुआ, जहाँ अनुसूचित जातियों को 14% आरक्षण प्राप्त था। राज्य विभाजन के उपरांत, 2001 की जनगणना और इंदिरा साहनी वाद की 50% की सीमा के दबाव में, SC कोटे को घटाकर 10% कर दिया गया। यह केवल सांख्यिकीय कटौती नहीं थी, बल्कि यह उस वर्ग के प्रशासनिक सशक्तिकरण पर एक ‘संवैधानिक ब्रेक’ था, जिसकी जनसंख्या 2011 तक बढ़कर 12.08% हो गई है।

झारखंड SC आरक्षण

प्रशासनिक विसंगतियाँ: रिक्तियों का ‘अदृश्य’ होना

समकालीन नियुक्तियों में SC वर्ग की भागीदारी का शून्य होना नीतिगत विफलता और ‘रोस्टर मैनेजमेंट’ की जटिलताओं का प्रमाण है:

  • FRO भर्ती का विरोधाभास: 170 पदों में मात्र 1 पद (0.58%) का आवंटन 10% के वैधानिक अधिकार का उपहास प्रतीत होता है। ‘कैडर सैचुरेशन’ (संवर्ग संतृप्ति) के तर्क ने नई मेधा के लिए द्वार बंद कर दिए हैं।
  • चौकीदार भर्ती और स्थानीयता का संकट: जिला स्तरीय संवर्ग होने के कारण कई जिलों में रोस्टर पॉइंट का लाभ SC वर्ग को नहीं मिल पा रहा है। सत्यजीत कुमार वाद के बाद उपजी विधिक स्थिति ने ‘बीट प्रणाली’ और ‘आरक्षण रोस्टर’ के बीच एक ऐसा द्वंद्व पैदा कर दिया है, जहाँ पद तो हैं, पर प्रतिनिधित्व शून्य है।
झारखंड SC आरक्षण

कानूनी गतिरोध और राजनीतिक इच्छाशक्ति

वर्तमान महागठबंधन सरकार द्वारा प्रस्तावित 77% आरक्षण विधेयक सामाजिक न्याय की दिशा में एक साहसिक प्रयास है, किंतु यह नौवीं अनुसूची और राजभवन की आपत्तियों के चक्रव्यूह में फंसा है। तमिलनाडु मॉडल की तर्ज पर इसे सुरक्षा दिलाना राज्य के लिए एक बड़ी संवैधानिक चुनौती है। साथ ही, निजी क्षेत्र में 75% स्थानीय आरक्षण पर उच्च न्यायालय की हालिया रोक दर्शाती है कि लोक-लुभावन नीतियों और संवैधानिक मर्यादाओं के बीच का संतुलन अत्यंत नाजुक है।

झारखंड SC आरक्षण

मूल्यांकन: झारखंड में अनुसूचित जातियों की स्थिति उस पथिक जैसी है जिसका गंतव्य तो स्पष्ट है, पर मार्ग के पत्थर बढ़ते जा रहे हैं। भूमिहीनता और आर्थिक विपन्नता के बीच सरकारी नौकरी इस वर्ग के लिए सामाजिक गतिशीलता का एकमात्र संबल है। जब वन क्षेत्र पदाधिकारी या चौकीदार जैसे पदों के विज्ञापन में ‘शून्य’ या ‘नगण्य’ संख्या अंकित होती है, तो वह केवल एक रिक्ति की कमी नहीं, बल्कि एक पूरे समुदाय की आकांक्षाओं की हत्या है।

संदेश: “सामाजिक न्याय केवल फाइलों का रोस्टर नहीं, बल्कि हाशिए पर खड़े अंतिम व्यक्ति का प्रशासन में भरोसा है। यदि 12% आबादी को 1% से भी कम प्रतिनिधित्व मिलता है, तो हमें यह पुनर्मूल्यांकन करना होगा कि ‘लोकतंत्र का समावेशी स्वरूप’ कहीं सांख्यिकीय मायाजाल में तो नहीं खो गया?”

सुझाव: प्रशासनिक शुचिता हेतु सरकार को ‘बैकलॉग’ रिक्तियों का श्वेत पत्र जारी करना चाहिए और 2011 की जनगणना के आधार पर 12% कोटे को वैधानिक रूप से पुनर्जीवित करने हेतु ठोस डेटा आधारित पैरवी करनी चाहिए।

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