झारखंड : अनुसूचित जाति का स्वास्थ्य संकट

झारखंड में अनुसूचित जाति (SC) की स्वास्थ्य स्थिति केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, ‘सामाजिक न्याय के संकट’ और ‘नीतिगत पक्षाघात’ प्रतीत होती है। सामाजिक न्याय और नीतिगत विफलता का विमर्श…

रांची: 15 नवंबर 2000 को ‘जल, जंगल और जमीन’ के संवैधानिक संरक्षण के वादे के साथ गठित झारखंड राज्य आज अपने गठन के दो दशकों बाद भी एक गंभीर ‘स्वास्थ्य सेवा त्रासदी’ का गवाह है। राज्य की लगभग 12.08% अनुसूचित जाति की आबादी, विशेष रूप से पलामू, चतरा और गढ़वा जैसे जिलों में, विकास के मुख्यधारा के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच फंसी हुई है, जो यह दर्शाता है कि यहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि एक संस्थागत मानवाधिकार उल्लंघन है।

अनुसूचित जाति का स्वास्थ्य

सांख्यिकीय विरोधाभास और ‘दूरी का दंड’

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आँकड़े एक विरोधाभासी स्थिति को दर्शाते हैं। जहाँ एक ओर राज्य ने मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) में उल्लेखनीय सुधार किया है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु मृत्यु दर (41.1) और पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (49.2) शहरी क्षेत्रों की तुलना में लगभग दोगुनी है।

अनुसूचित जाति की बस्तियाँ प्रायः मुख्य ग्रामों से भौगोलिक रूप से पृथक होती हैं, जिसे समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में ‘डिस्टेंस पेनल्टी’ के रूप में संदर्भित किया जाता है। यह भौगोलिक विलगता आपातकालीन परिस्थितियों में ‘स्वर्ण समय’ के महत्व को कम कर देती है, जिसके परिणामस्वरूप रोकी जा सकने वाली मृत्युओं को भी ‘नियति’ के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है।

अवसंरचनात्मक ढहता ढांचा और मानव संसाधन का अकाल

पलामू प्रमंडल में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) की 73% कमी और चिकित्सा अधिकारियों के 61% से अधिक रिक्त पद यह दर्शाते हैं कि राज्य का स्वास्थ्य तंत्र गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। गढ़वा जैसे जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 66% कमी के कारण ‘रेफरल कल्चर’ का विकास हुआ है, जो गरीब दलित परिवारों को निजी अस्पतालों के कर्ज के अंतहीन जाल में धकेल देता है। यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य के ‘लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण’ के दावे को पूरी तरह खंडित करती है।

संस्थागत जातिवाद और चिकित्सीय उदासीनता

स्वास्थ्य संकट का सबसे गंभीर पहलू ‘चिकित्सीय पूर्वाग्रह’ है। बीआईटी मेसरा में राजा पासवान की मृत्यु और एमजीएम अस्पताल जमशेदपुर में एक गर्भवती महिला के निधन की घटनाएँ केवल ‘लापरवाही’ नहीं, बल्कि ‘संस्थागत जातिवाद’ के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। जब कोई व्यवस्था किसी व्यक्ति की जाति के आधार पर उसके उपचार में ‘कैजुअल एप्रोच’ (झारखंड उच्च न्यायालय की टिप्पणी के अनुसार) अपनाती है, तो यह ‘अपकृत्य दायित्व’ का विषय बन जाता है।

नीतिगत मृगतृष्णा: आयुष्मान भारत की सीमाएं

अनुसूचित जाति का स्वास्थ्य

आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं ‘डिजिटल साक्षरता’ और ‘दस्तावेजी विसंगतियों’ के कारण हाशिए के समुदायों के लिए एक ‘डिजिटल मृगतृष्णा’ साबित हो रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 1.3% उपयोग दर यह दर्शाती है कि ‘कैशलेस’ सुविधा का लाभ उन तक नहीं पहुँच रहा है, जिनके पास न तो ‘गोल्डन कार्ड’ है और न ही निजी अस्पतालों के शोषण से बचने का सामाजिक प्रभाव।

निष्कर्ष: झारखंड की यह स्वास्थ्य त्रासदी स्पष्ट करती है कि स्वास्थ्य सेवा केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि एक राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रश्न है। एनीमिया और कुपोषण की 65% से अधिक दर एक मौन महामारी है जो आने वाली पीढ़ियों के संज्ञानात्मक विकास को बाधित कर रही है। जब तक स्वास्थ्य नीतियों में जाति-संवेदी दृष्टिकोण और सोशल ऑडिट को अनिवार्य नहीं किया जाता, तब तक स्वस्थ झारखंड का सपना एक संवैधानिक मृगतृष्णा ही बना रहेगा।

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