सावित्रीबाई फुले: बहुजन अस्मिता, संघर्ष -भविष्य की आधारशिला

सावित्रीबाई फुले का सच्चा सम्मान तब होगा जब बहुजन समाज का हर घर एक ‘स्कूल’ बन जाए, हर महिला ‘आर्थिक रूप से स्वतंत्र’ हो, और समाज से मानसिक गुलामी की जंजीरें पूरी तरह टूट जाएं। यही हमारी भविष्य की जिम्मेदारी।

रांची: जनवरी भारत के इतिहास में मात्र एक तिथि नहीं है; यह इस राष्ट्र की वंचित महिलाओं और बहुजन समुदाय के लिए ‘आत्म-सम्मान’ और ‘मुक्ति’ का वास्तविक उत्सव है। क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले का जन्म उस युग में हुआ था, जब भारत की सामाजिक संरचना में जाति व्यवस्था की क्रूरता और पितृसत्ता का अंधकार अपने चरम पर था।

बहुजन समुदाय के लिए उनकी जयंती केवल माल्यार्पण का एक औपचारिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि उस “प्रतिरोध की संस्कृति” को आत्मसात करने का संकल्प है, जिसने सदियों पुरानी शोषणकारी व्यवस्था की नींव को हिला दिया था। यह दिन बहुजन समाज के लिए आत्म-चिंतन, ऐतिहासिक चेतना और भविष्य के निर्माण की आधारशिला रखने का प्रतीक है।

सावित्रीबाई फुले

उनके युगांतरकारी योगदान का चार प्रमुख स्तंभों

​1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: ज्ञान की सत्ता को सीधी चुनौती

(Historical Perspective: Challenging the Monopoly on Knowledge)

इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत में सदियों तक ज्ञान पर एक विशिष्ट वर्ग का एकाधिकार रहा है। शूद्रों, अति-शूद्रों (बहुजन) और महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार धार्मिक एवं सामाजिक रूप से अवरुद्ध थे। सावित्रीबाई का संघर्ष इसी ‘मानसिक नाकाबंदी’ को तोड़ने के लिए था।

  • व्यवस्था पर प्रहार: 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए पहला विद्यालय स्थापित करना एक असाधारण घटना थी। यह उन धर्मशास्त्रों पर सीधा प्रहार था, जो यह मानते थे कि स्त्री और शूद्र के अध्ययन से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। उन्होंने यह सिद्ध किया कि ज्ञान किसी की निजी संपत्ति नहीं है।
  • कीचड़ बनाम चेतना: जब सावित्रीबाई विद्यालय जाती थीं, तो उन पर कीचड़ और गोबर फेंका जाता था। वह कीचड़ केवल गंदगी नहीं थी, बल्कि उस समय के समाज की ‘मानसिक सड़ांध’ थी। सावित्रीबाई ने उस अपमान के विष को अमृत में परिवर्तित किया, ताकि आने वाली पीढ़ियां सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सकें।
  • निष्कर्ष: ऐतिहासिक रूप से, उनका जन्म दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि तथागत गौतम बुद्ध द्वारा प्रारंभ की गई समतामूलक शिक्षा संस्कृति, बाद में बहुजनों को ‘दान’ में नहीं मिली, बल्कि सावित्रीबाई और जोतिराव के ‘कठोर संघर्ष’ से प्राप्त की गई है।

​2. सामाजिक परिप्रेक्ष्य: मानवाधिकार और नारीवाद की मूल धुरी

(Social Perspective: Intersectionality of Caste and Gender)

आज के आधुनिक नारीवादी विमर्श में प्रायः ‘लिंग’ (Gender) पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता है, किंतु सावित्रीबाई का संघर्ष ‘जाति और लिंग’ दोनों के अंतर्विरोधों के विरुद्ध एक साथ था। वे भारत की प्रथम ‘इंटरसेक्शनल फेमिनिस्ट’ थीं।

  • सत्यशोधक विवाह: उन्होंने और महात्मा जोतिराव फुले ने विवाह की एक ऐसी क्रांतिकारी पद्धति शुरू की, जिसमें ब्राह्मण-पुरोहित की कोई जगह नहीं थी। वर-वधू एक-दूसरे को ‘समानता’ की शपथ लेते थे। यह सामाजिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने वाला सबसे बड़ा हथियार था।
  • बालहत्या प्रतिबंधक गृह: विधवाओं का शोषण और गर्भवती होने पर उनकी आत्महत्या—उस दौर का कड़वा सच था। सावित्रीबाई ने अपने घर को प्रसव केंद्र में बदल दिया। यह केवल ‘करुणा’ नहीं थी, यह महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा‘ (Social Security) का पहला ठोस कदम था।
  • पानी का अधिकार: अछूतों के लिए अपने घर का पानी का टैंक खोलना, केवल प्यास बुझाना नहीं था; यह छुआछूत के अमानवीय ढांचे पर एक करारा तमाचा था।

​3. आर्थिक परिप्रेक्ष्य: आत्मनिर्भरता का अर्थशास्त्र

(Economic Perspective: Economics of Self-Reliance)

बहुजन समाज की निर्धनता का मूल कारण अशिक्षा और अवसरों की कमी रही है। सावित्रीबाई का दर्शन विशुद्ध रूप से आर्थिक स्वतंत्रता से जुड़ा था। उनका स्पष्ट संदेश था –

स्वाभिमान से जीने के लिए पढ़ाई करो, पाठशाला ही इंसानों का सच्चा गहना है।

  • विद्या से वित्त: उनका यह सुविचार था कि अविद्या ही निर्धनता का मूल कारण है। जब समाज का बहुसंख्यक वर्ग शिक्षित होगा, तभी वह साहूकारों के उच्च ब्याज दरों और जमींदारों के शोषणकारी तंत्र को समझ पाएगा। शिक्षा ही आर्थिक स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करती है।
  • श्रम की गरिमा: वर्ष 1896-97 के भीषण अकाल के समय, उन्होंने न केवल अन्नदान किया, बल्कि ब्रिटिश सरकार को भी इस बात के लिए विवश किया कि वे निर्धन व्यक्तियों को ‘कार्य’ प्रदान करें। यह उनका ‘कल्याणकारी अर्थशास्त्र’ का सिद्धांत था, जो दान के बजाय रोजगार के अधिकार पर बल देता था।
  • आज की प्रासंगिकता: वर्तमान निजीकरण के युग में, जब शिक्षा महंगी होकर सामान्य जन की पहुँच से बाहर हो रही है, सावित्रीबाई का ‘निःशुल्क और समान शिक्षा’ का प्रतिमान अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।

​4. भविष्य का दृष्टिकोण: नई चुनौतियों के लिए प्रेरणा

(Future Perspective: Blueprint for the Future)

​सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन मनाना तब तक सार्थक नहीं है, जब तक हम इसे भविष्य की चुनौतियों से न जोड़ें। बहुजन समाज के लिए आगे का रास्ता क्या हो?

  • वैज्ञानिक चेतना: सावित्रीबाई अंधविश्वास की घोर विरोधी थीं। आज जब समाज में पाखंड और अंधविश्वास नए रूपों में लौट रहा है, तो उनकी वैज्ञानिक सोच‘ (Scientific Temper) को अपनाना ही एकमात्र कवच है।
  • सत्ता में भागीदारी: बहुजन समाज को अब केवल ‘वोटर’ नहीं, बल्कि नीतिनिर्माता‘ (Policy Maker) बनना होगा। इसके लिए उस शिक्षा की जरूरत है जो ‘सवाल करना’ सिखाए, न कि केवल ‘आज्ञा पालन’ करना।
  • डिजिटल क्रांति: 19वीं सदी की चुनौती ‘अक्षर ज्ञान’ थी, 21वीं सदी की चुनौती डिजिटल ज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस‘ (AI) है। उनकी विरासत को आगे ले जाने का मतलब है कि आज का बहुजन युवा आधुनिक तकनीक और विज्ञान में निपुण होकर विश्व पटल पर अपनी जगह बनाए।

​सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें एक ही बात सिखाता है। क्रांति रातोंरात नहीं होती, उसके लिए पीढ़ियों को खपना पड़ता है।बहुजन समाज के लिए 3 जनवरी का दिन केवल एक जयंती नहीं, बल्कि वैचारिक पुनर्जागरण” (Ideological Renaissance) का दिन है। यदि हम केवल उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाते हैं, लेकिन अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा नहीं देते, या आपस में जातिगत भेदभाव करते हैं, तो हम उनके संघर्ष का अपमान कर रहे हैं।

क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले का सच्चा सम्मान तब होगा जब बहुजन समाज का हर घर एक स्कूल बन जाए, हर महिला आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो, और समाज से मानसिक गुलामी की जंजीरें पूरी तरह टूट जाएं। ​यही उनके सपनों का भारत है और यही हमारी भविष्य की जिम्मेदारी।

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