संत रैदास का बेगमपुरा दर्शन वंचितों के लिए एक लोकतांत्रिक मार्गदर्शिका है, जो उन्हें समतावादी और गरिमापूर्ण भविष्य की ओर प्रेरित करती है।
रांची: ”बेगमपुरा” संत रैदास का वह कालजयी विज़न है, जहाँ न कोई ‘गम’ है, न भेदभाव और न ही कोई भय। 15वीं सदी का यह दर्शन झारखंड की वंचित आबादी के लिए आज भी सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा घोषणापत्र है।
एक ओर रैदास का ‘बेगमपुरा’ है, जो समानता और मानवीय गरिमा की बात करता है; तो दूसरी ओर झारखंड का कठोर यथार्थ है, जहाँ राज्य की 12.08% अनुसूचित जाति की आबादी आज भी भूमिहीनता, कम साक्षरता और सामाजिक हाशिये पर खड़ी है। पलामू से लेकर धनबाद तक, ‘हमशहरी’ बनने की यह छटपटाहट बेगमपुरा के आदर्शों और ज़मीनी हकीकत के बीच के गहरे फासले को दर्शाती है।

झारखंड की अनुसूचित जातियों के लिए यह दर्शन आज भी सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान का जीवंत माध्यम है। यह राज्य में व्याप्त आर्थिक विषमता और जातिगत जड़ता को चुनौती देते हुए शिक्षा, भूमि अधिकार और राजनीतिक भागीदारी की मांग को वैचारिक ऊर्जा प्रदान करता है। बेगमपुरा वंचितों के लिए एक लोकतांत्रिक मार्गदर्शिका है, जो उन्हें समतावादी और गरिमापूर्ण भविष्य की ओर प्रेरित करती है।
बेगमपुरा: एक समतावादी यूटोपिया
रैदास का ‘बेगमपुरा’ (बिना गम का शहर) महज एक काव्य कल्पना नहीं, बल्कि एक राजनैतिक और सामाजिक घोषणापत्र है। यह दर्शन 15वीं सदी में उस समय दिया गया जब समाज जातिगत बेड़ियों में जकड़ा हुआ था।
- मूल मंत्र: “दुखू अंदोह नहीं तिहिं ठांउ” – अर्थात एक ऐसा स्थान जहाँ न कोई मानसिक संताप है, न ही सामाजिक चिंता।
- आर्थिक और राजनीतिक न्याय: यहाँ न ‘खिराज’ (टैक्स) का बोझ है और न ही सत्ता का ‘खौफ’। यह आधुनिक ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) की प्रारंभिक परिकल्पना है।
- नागरिकता की समानता: यहाँ कोई छोटा-बड़ा नहीं, सब ‘हमशहरी’ (समान नागरिक) हैं।
झारखंड का यथार्थ: आदर्श और वास्तविकता का द्वंद्व
जब हम बेगमपुरा के सिद्धांतों को झारखंड की 12.08% SC आबादी की जमीनी हकीकत पर लागू करते हैं, तो एक गहरा विरोधाभास सामने आता है:
क. जनसांख्यिकीय और सामाजिक संरचना: झारखंड में SC आबादी (लगभग 39.8 लाख) मुख्य रूप से पलामू, चतरा और धनबाद जैसे जिलों में केंद्रित है। रैदास के ‘जातिहीन समाज’ के सपने के विपरीत, यहाँ की सामाजिक संरचना आज भी जातिगत पहचान और पदानुक्रम (Hierarchy) पर आधारित है।
ख. आर्थिक विषमता और भूमिहीनता
- बेगमपुरा का आदर्श: संपत्ति की सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता।
- झारखंड की हकीकत: राज्य के 58.4% ग्रामीण दलित परिवार भूमिहीन हैं। CNT/SPT एक्ट जैसे सुरक्षात्मक कानूनों के बावजूद, खनन और ‘लैंड बैंक’ नीतियों के कारण विस्थापन एक क्रूर सच्चाई है। यहाँ दलित ‘मालिक’ नहीं, बल्कि ‘सीमांत श्रमिक’ बनकर रह गए हैं।
ग. शिक्षा और स्वास्थ्य: विकास की अंधी दौड़
- शिक्षा: जहाँ रैदास ज्ञान और चेतना की बात करते हैं, वहीं झारखंड में SC साक्षरता दर (55.89%) राज्य के औसत से काफी नीचे है। स्कूल छोड़ने की उच्च दर (Dropout Rate) भविष्य की संभावनाओं को कुचल रही है।
- स्वास्थ्य: ‘दुःख विहीन काया’ का सपना एनीमिया (65%+) और कुपोषण के आंकड़ों के नीचे दबा हुआ है।
‘डिग्निटी ऑफ लेबर’ बनाम सामाजिक भेदभाव
रैदास ने श्रम को ईश्वर की पूजा माना (‘नेक कमाई’), लेकिन झारखंड के सामाजिक परिवेश में आज भी हाथ के श्रम (जैसे सफाई या चर्मकारी) को हेय दृष्टि से देखा जाता है।
- सामाजिक न्याय: NCRB के आंकड़े और डायन प्रथा जैसी कुरीतियाँ बताती हैं कि दलितों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव (‘खौफ’) अभी भी मौजूद है, जो बेगमपुरा की मूल भावना के खिलाफ है।
- योजनाओं का अभाव: मनरेगा और पेंशन योजनाएं ‘जीवन रक्षक’ तो हैं, लेकिन वे उस ‘स्वाभिमान’ को बहाल नहीं कर पाई हैं जिसकी कल्पना रैदास ने की थी।
निष्कर्ष: भविष्य की दिशा
’बेगमपुरा’ झारखंड के लिए केवल एक आध्यात्मिक गीत नहीं, बल्कि नीतिगत सुधारों (Policy Reforms) की एक चेकलिस्ट है।
- सामाजिक समरसता: जब तक “हम सहरी सु मीतु हमारा” (नागरिक ही मित्र है) का भाव नहीं आता, विकास अधूरा है।
- कार्रवाई की आवश्यकता: भूमि सुधारों को कड़ाई से लागू करना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना और अत्याचार निवारण कानूनों का सख्त पालन ही झारखंड को ‘बेगमपुरा’ की दिशा में ले जा सकता है।
मसलन, रैदास का दर्शन हमें याद दिलाता है कि ‘स्वतंत्रता‘ का अर्थ केवल राजनीतिक आजादी नहीं, बल्कि भय, भूख और भेदभाव से मुक्ति है। झारखंड का विकास मॉडल जब तक अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को केंद्र में नहीं रखता, बेगमपुरा का सपना अधूरा रहेगा।