झारखंड के दलित मजदूरों की समस्या केवल ‘मजदूरी’ की नहीं, बल्कि ‘गरिमा’ की है। जब तक समाज में मजबूत यूनियन नहीं बनते, सरकार को मूकदर्शक बने रहने के बजाय सक्रिय अभिभावक बनना होगा।
रांची: झारखंड की सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में ‘जल, जंगल, जमीन’ का नारा बुलंद है, जो राज्य की आदिवासी पहचान को सशक्त करता है। लेकिन इस शोर में राज्य की आबादी का 12.08% हिस्सा—अनुसूचित जाति (SC) समुदाय—हाशिए पर खड़ा है। असंगठित क्षेत्र में पसीना बहाने वाला यह वर्ग, मजबूत ‘यूनियन’ (संगठन) के अभाव में “आधुनिक बंधुआ मजदूरी” जैसी स्थितियों में जीने को विवश है। समझना जरूरी है कि यह बिखराव क्यों है? इसका क्या मूल्य चुकाना पड़ रहा है? सरकार इसमें हस्तक्षेप कर कैसे बदलाव ला सकती है।
संगठन की विफलता: संरचनात्मक कारण
दलित मजदूरों का संगठित न हो पाना केवल उनकी निष्क्रियता नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक-आर्थिक मजबूरियों का परिणाम है:
- बिखरा हुआ और पलायनकर्ता कार्यबल: ये मजदूर किसी एक छत के नीचे नहीं, बल्कि ईंट-भट्टों और निर्माण स्थलों पर बिखरे हैं। ‘बाध्यकारी पलायन‘ (Distress Migration) के कारण साल का बड़ा हिस्सा वे दूसरे राज्यों में बिताते हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर एकजुटता (Mobilization) असंभव हो जाती है।
- गरीबी बनाम सक्रियता: ‘रोज कमाओ, रोज खाओ’ की जद्दोजहद में फंसा मजदूर अपनी दिहाड़ी छोड़कर अधिकारों के लिए धरने पर नहीं बैठ सकता।
- भय और संरक्षण की कमी: पलामू जैसे क्षेत्रों में सामंती डर और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण, यूनियन बनाने का प्रयास करने वालों को हिंसा या रोजगार छिनने का डर सताता है।
यूनियन न होने की कीमत: चौतरफा शोषण
’सामूहिक सौदेबाजी’ (Collective Bargaining) की शक्ति के बिना, मजदूर हर मोर्चे पर हारता है:
- आर्थिक शोषण: न्यूनतम मजदूरी न मिलना और वेतन चोरी (Wage Theft) आम है। ठेकेदार जानते हैं कि मजदूर के पीछे कोई संगठन खड़ा नहीं है।
- असुरक्षित भविष्य: पीएफ (PF), पेंशन और स्वास्थ्य बीमा के अभाव में, जवानी खपाने के बाद इनका बुढ़ापा लाचारी में बीतता है।
- जीवन का जोखिम: अवैध खनन या सिलिकोसिस जैसी बीमारियों से मौत होने पर, बिना किसी कानूनी लड़ाई के मामलों को रफा-दफा कर दिया जाता है।
समाधान की दिशा: सरकार क्या कर सकती है?
चूंकि सामाजिक और आर्थिक कारणों से दलित मजदूरों के लिए स्वयं का ‘मजबूत यूनियन’ खड़ा करना कठिन है, इसलिए सरकार को एक ‘मध्यस्थ‘ और ‘संरक्षक‘ की भूमिका निभानी होगी। राज्य निम्नलिखित ठोस कदम उठा सकता है:
क) राज्य–स्तरीय कल्याण बोर्ड का सशक्तिकरण: सरकार को केवल निर्माण मजदूरों तक सीमित न रहकर, ‘असंगठित कामगार कल्याण बोर्ड‘ का दायरा बढ़ाना चाहिए।
- उपाय: हर मजदूर का अनिवार्य पंजीकरण हो और एक ‘त्रि-पक्षीय निकाय’ (सरकार, ठेकेदार, मजदूर प्रतिनिधि) बने जो वेतन और शर्तों की निगरानी करे। इससे यूनियन न होने की कमी को संस्थागत रूप से भरा जा सकेगा।
ख) तकनीक का उपयोग (Digital Intervention): जहां मजदूर संगठित नहीं हो सकते, वहां तकनीक उनकी आवाज बन सकती है।
- उपाय: एक ऐसा ‘शिकायत निवारण ऐप‘ या हेल्पलाइन शुरू की जाए, जहां मजदूर अपनी पहचान गुप्त रखकर वेतन न मिलने या शोषण की शिकायत कर सकें। यह ‘वर्चुअल यूनियन’ की तरह काम करेगा।
ग) अंतरराज्यीय प्रवासी समन्वय (Inter-state Coordination): झारखंड के दलित मजदूरों का बड़ा हिस्सा पलायन करता है।
- उपाय: झारखंड सरकार को केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे राज्यों के साथ समझौता (MoU) करना चाहिए। गंतव्य राज्यों में ‘झारखंड श्रमिक सहायता केंद्र‘ खोले जाएं, जो मजदूरों के लिए एक कानूनी कवच का काम करें।
घ) कानूनी सहायता और जागरूकता: यूनियन का सबसे बड़ा काम होता है मजदूरों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना।
- उपाय: सरकार को ब्लॉक स्तर पर ‘श्रमिक मित्र‘ नियुक्त करने चाहिए (जैसे स्वास्थ्य में आशा दीदी होती हैं), जो दलित बस्तियों में जाकर ई-श्रम कार्ड, बीमा और मनरेगा के बारे में जागरूकता फैलाएं और फॉर्म भरवाएं।
ङ) सहकारी समितियों (Cooperatives) को बढ़ावा: यदि ट्रेड यूनियन बनाना कठिन है, तो सरकार को श्रमिक सहकारी समितियों को बढ़ावा देना चाहिए। इससे मजदूर ठेकेदारों पर निर्भर रहने के बजाय खुद काम के ठेके ले सकेंगे, जिससे आर्थिक सशक्तिकरण आएगा।
निष्कर्ष: झारखंड के दलित मजदूरों की समस्या केवल ‘मजदूरी’ की नहीं, बल्कि ‘गरिमा’ की है। जब तक समाज में मजबूत यूनियन नहीं बन पाते, तब तक सरकार को मूकदर्शक बने रहने के बजाय सक्रिय अभिभावक बनना होगा। कड़े श्रम कानून, प्रभावी कल्याणकारी बोर्ड और तकनीकी निगरानी ही वह रास्ता है, जिससे इस बिखरी हुई आबादी को मुख्यधारा में लाया जा सकता है।