मरांग गोमके पारदेशीय छात्रवृत्ति योजना और एससी भागीदारी

​झारखंड सरकार की मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृत्ति योजना केवल एक वित्तीय सहायता कार्यक्रम नहीं, बल्कि ऐतिहासिक वंचना के विरुद्ध एक सशक्त ‘बौद्धिक प्रतिशोध’ है।

रांची: कल्पना कीजिए पलामू या चतरा के किसी सुदूर गाँव की एक दलित बस्ती की, जहाँ एक मेधावी छात्र सीमित संसाधनों और सदियों पुरानी सामाजिक वर्जनाओं के बीच, लालटेन की रोशनी में बाबासाहेब अंबेडकर या जयपाल सिंह मुंडा के संघर्षों को पढ़ता है। उसके लिए लंदन या कैम्ब्रिज की ऐतिहासिक मीनारें केवल एक दूरस्थ स्वप्न नहीं, बल्कि एक असंभव दुनिया थीं। लेकिन आज, झारखंड सरकार की ‘मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृत्ति योजना’ ने उस असंभव को ‘अधिकार’ में बदल दिया है।

मरांग गोमके पारदेशीय
मरांग गोमके पारदेशीय

​झारखंड सरकार की ‘मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृत्ति योजना’ केवल एक वित्तीय सहायता कार्यक्रम नहीं, बल्कि ऐतिहासिक वंचना के विरुद्ध एक सशक्त ‘बौद्धिक प्रतिशोध’ है। यह योजना शिक्षा के माध्यम से सामाजिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन लाने का एक साहसिक प्रयास है। अनुसूचित जाति (SC) के संदर्भ में इस योजना का विश्लेषण एक साथ आशा, चुनौती और भविष्य की संभावनाओं की त्रिवेणी प्रस्तुत करता है। इस योजना का एक गहन विश्लेषण।

​पृष्ठभूमि: विरासत का लोकतंत्रीकरण

​इस योजना का नामकरण मरांग गोमकेजयपाल सिंह मुंडा के नाम पर करना अत्यंत प्रतीकात्मक है। 1920 के दशक में जिस तरह एक आदिवासी युवा ने ऑक्सफोर्ड जाकर वैश्विक पटल पर अपनी छाप छोड़ी थी, यह योजना उसी इतिहास को दोहराने का अवसर अब समाज के हर वंचित वर्ग को दे रही है।

  • नीतिगत विकास: 2020 में केवल जनजातीय (ST) छात्रों के लिए शुरू हुई यह पहल, 2022 में समावेशिता का विस्तार करते हुए अनुसूचित जाति (SC), पिछड़ों और अल्पसंख्यकों तक पहुंची।
  • उद्देश्य: यह प्रयास सदियों से हाशिए पर रहे समुदायों को ‘स्थानीय संघर्ष’ से निकालकर ‘वैश्विक नेतृत्व’ की ओर ले जाने का है।

​अनुसूचित जाति (SC) की भागीदारी: आँकड़ों का विश्लेषण

अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित कोटे और वास्तविक चयन के आँकड़े एक ‘उतार-चढ़ाव भरी यात्रा’ (Volatile Trajectory) को दर्शाते हैं। यह डेटा इस बात का प्रमाण है कि केवल नीति बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके क्रियान्वयन के लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की आवश्यकता है।

विश्लेषणात्मक निष्कर्ष: कुल 15 उपलब्ध सीटों (2022-25) में से केवल 8 पर चयन होना (53.3% उपयोग) यह सिद्ध करता है कि प्रतिभा की कमी नहीं है, बल्कि अवसर और पहुँच‘ (Opportunity vs Access) के बीच एक तकनीकी खाई है।

​चयन प्रक्रिया और संरचनात्मक चुनौतियां

​योजना का ‘फुल-फंडिंग मॉडल’ (शिक्षण शुल्क + जीवन यापन + यात्रा) इसे भारत की सबसे आकर्षक योजनाओं में से एक बनाता है, लेकिन इसकी चयन प्रक्रिया ‘दोधारी तलवार’ है।

  • पात्रता का विरोधाभास: एक तरफ सरकार वंचितों को भेजना चाहती है, दूसरी तरफ प्रवेश की शर्तें (IELTS/TOEFL, अनकंडीशनल ऑफर लेटर) अत्यंत कुलीन और कठोर हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि के SC छात्रों के लिए भाषाई बाधा सबसे बड़ी दीवार है।
  • विषय की सीमा: केवल 31 विषयों तक सीमित दायरा, मानविकी या कला में रुचि रखने वाले मेधावी SC छात्रों को बाहर कर देता है।
  • प्रशासनिक पेचीदगियां: आय प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण और पासपोर्ट-वीजा की जटिल प्रक्रिया कई बार छात्रों के हौसले पस्त कर देती है।

भविष्य की दिशा: विस्तार और संभावनाएं (2025 से आगे)

​अक्टूबर 2024 में सीटों की संख्या को 25 से बढ़ाकर 50 करना और अनुसूचित जाति (SC) का कोटा 5 से बढ़ाकर 10 करना एक स्वागत योग्य कदम है। यह विस्तार सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाता है।

आगे की राह सुझाव:

  1. प्रीएप्लीकेशन सपोर्ट: केवल छात्रवृत्ति देना काफी नहीं है; सरकार को ‘मेंटरशिप सेल’ बनाने होंगे जो छात्रों को IELTS की तैयारी और विश्वविद्यालय आवेदन में मदद करें।
  2. लचीलापन: विषयों की सूची का विस्तार किया जाना चाहिए ताकि विविध प्रतिभाओं को मौका मिले।
  3. ट्रैकिंग सिस्टम: विदेशों से लौटने वाले छात्रों का कौशल राज्य के विकास में कैसे उपयोग हो, इसका एक ठोस रोडमैप तैयार होना अनिवार्य है।

​झारखंड सरकार की यह योजना सामाजिक न्याय के इतिहास में एक मूक क्रांति है। अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए यह लंदन और कैम्ब्रिज के बंद दरवाजों को खोलने वाली चाबी है। यद्यपि अभी चयन के आँकड़े पूर्ण क्षमता तक नहीं पहुँचे हैं, लेकिन 2023 का पूर्ण बैच यह आशा जगाता है कि सही मार्गदर्शन से बाधाएं टूट सकती हैं।

​यह योजना केवल एक डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह ज्ञान की शक्ति से सत्ता और समाज में भागीदारी सुनिश्चित करने का एक सशक्त दस्तावेज है। भविष्य में यदि प्रशासनिक बाधाओं को दूर कर लिया गया, तो यह योजना झारखंड के दलित और वंचित समाज से विश्व-स्तरीय चिंतक और नेता पैदा करने की क्षमता रखती है।

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