नियम ही लोकतंत्र का वास्तविक ‘राजा’ है। यदि नियम टूटता है, तो न्याय की नींव हिल जाती है। 29 जनवरी की सुनवाई में यह तय होगा कि झारखंड में सत्ता का बंटवारा ‘संविधान की रूह’ से निर्देशित होगा या ‘सियासी सुविधा’ की कलम से…
रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने नगर निकाय चुनाव में आरक्षण रोस्टर को लेकर जो जवाब तलब किया है, वह महज फाइलों का आदान-प्रदान नहीं है। यह ‘सत्ता के गणित‘ और ‘संवैधानिक शुचिता‘ के बीच चल रहे एक गहरे अंतर्द्वंद्व का प्रकटीकरण है। 29 जनवरी की तारीख केवल एक सुनवाई की तिथि नहीं, बल्कि यह तय करने का दिन है कि लोकतंत्र में ‘नियमों की लकीर’ बड़ी है या ‘राजनीतिक सुविधा का तर्क’।

सरकार का संभावित पक्ष: कठोर गणित बनाम व्यापक अस्मिता
सरकार न्यायालय की चौखट पर यह तर्क दे सकती है कि आरक्षण रोस्टर कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि ‘दीर्घकालिक प्रतिनिधित्व संतुलन’ का एक माध्यम है। उनके तर्कों की धुरी संभवतः इन तीन स्तंभों पर टिकी होगी:
- राज्य की रूह और आदिवासी अस्मिता: सरकार का सबसे भावुक तर्क यह होगा कि झारखंड के अस्तित्व का आधार ही ‘आदिवासी अस्मिता’ है। अतः, चक्रधरपुर जैसे क्षेत्रों में मात्र 8% के स्थानीय आंकड़े में उलझने के बजाय, राज्य के ‘संवैधानिक चरित्र‘ को जीवित रखने के लिए ST वर्ग को प्राथमिकता दी गई। इसे वे ‘त्रुटि’ नहीं, बल्कि एक ‘ऐतिहासिक सकारात्मक पहल’ कहेंगे।
- रोटेशन का तकनीकी न्याय: आरक्षण ठहरा हुआ पानी नहीं है। सरकार कहेगी कि ‘रोटेशन चक्र’ के पहिये के अनुसार अब बारी ST की है। यदि SC वर्ग को पूर्व में प्रतिनिधित्व मिल चुका है, तो अब आबादी कम होने के बावजूद सीट ST को देना नियमों का पालन है, उल्लंघन नहीं।
- संवैधानिक ‘स्पेस‘ का उपयोग: अनुच्छेद 243-T में निहित “यथाशक्य” शब्द सरकार के लिए ढाल बनेगा। उनका कहना होगा कि संविधान उन्हें केवल ‘कैलकुलेटर’ चलाने वाला क्लर्क नहीं मानता, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन साधने का ‘विवेकाधिकार‘ (Discretion) सौंपता है।
आहत लोकतंत्र: अवसर की चोरी और वंचना का पदानुक्रम
इस विवाद की जड़ में कोई सामान्य प्रक्रियात्मक भूल नहीं, बल्कि एक समुदाय के ‘राजनीतिक रूप से अदृश्य’ हो जाने का गहरा भय है। यह मुद्दा नियमों के उल्लंघन से कहीं आगे, ‘समानों के बीच असमानता’ के बीजारोपण का है:
- अवसर की ‘संस्थागत चोरी‘ और मौन होती आवाजें: आरक्षण रोस्टर लोकतंत्र का एक पवित्र ‘वचन पत्र‘ है, जो कहता है कि “अगली बारी तुम्हारी होगी।” जब नियमतः पहली बारी SC की थी और उसे लांघकर ST को दे दी गई, तो यह केवल एक सीट का नुकसान नहीं है। यह उस समुदाय की राजनीतिक आवाज को अगले 5 वर्षों के लिए ‘मौन‘ कर देने जैसा है। लोकतंत्र में अपनी बारी खोना, अपने अस्तित्व के एक हिस्से को खोने के समान है।
- उल्टा न्याय का विरोधाभास: चक्रधरपुर का उदाहरण ‘न्याय के क्रूर विरोधाभास’ को नंगा करता है। जब कम आबादी वाले वर्ग को, बहुसंख्यक वंचित वर्ग (SC) के ऊपर अधिमान दिया जाता है, तो यह ‘सकारात्मक भेदभाव’ नहीं, बल्कि ‘अल्पमत का थोपा गया विशेषाधिकार‘ बन जाता है। यह SC समुदाय को यह महसूस कराता है कि लोकतंत्र के इस नए गणित में उनकी गिनती और उनका दर्द, दोनों ‘कमतर’ हैं।
- पीड़ा का पदानुक्रम : इस प्रकरण का सबसे मर्मभेदी पहलू यह संदेश है कि प्रशासन की तराजू में एक वंचित वर्ग (ST) की पीड़ा, दूसरे वंचित वर्ग (SC) से अधिक ‘वजनी’ है। संवैधानिक क्रम (SC first > ST socond) को तोड़ना दो शोषित समुदायों के बीच एक अनावश्यक ‘प्रतिस्पर्धी संघर्ष‘ को जन्म देता है। वंचनाओं के बीच यह तुलना सामाजिक समरसता के ताने-बाने को तार-तार कर सकती है।
सत्ता का लोभ बनाम संविधान की आत्मा
यह विवाद केवल सीटों के बंटवारे का नहीं, बल्कि ‘विश्वास के संकट‘ का है।
- प्रक्रिया ही न्याय है: लोकतंत्र में ‘परिणाम’ से अधिक पवित्र ‘प्रक्रिया’ होती है। यदि रोस्टर के निर्धारित क्रम (SC > ST > महिला) को बिना किसी ठोस वैधानिक आधार के बदला गया, तो यह ‘विवेकाधिकार’ का उपयोग नहीं, बल्कि ‘दुरुपयोग‘ है।
- प्रतिनिधित्व की हत्या: जब राजनीति, आंकड़ों पर हावी हो जाती है, तो ‘आनुपातिक न्याय‘ दम तोड़ देता है। एक वंचित वर्ग के संवैधानिक अवसर को दूसरे के पक्ष में ‘अदृश्य’ कर देना भविष्य में समुदायों के बीच ‘प्रतिस्पर्धी अविश्वास’ की खाई खोदेगा।