झारखंड दलित नेतृत्व:12.8% आबादी वाले इस समुदाय के लिए, संविधान द्वारा प्रदत्त ‘आरक्षण’ के बावजूद, व्यवस्था ने उन्हें उनके ‘अधिकारों’ से वंचित रखा है।
रांची: यह लेख झारखंड में अनुसूचित जाति (SC) के विकास के दावों के पीछे की गंभीर वास्तविकता को उजागर करता है। 12.8% आबादी वाले इस समुदाय के लिए, संविधान द्वारा प्रदत्त ‘आरक्षण’ के बावजूद, व्यवस्था ने उन्हें उनके ‘अधिकारों’ से वंचित रखा है।
झारखंड में दलित समुदाय के लिए 73वें संशोधन का राजनीतिक सशक्तिकरण केवल एक दिखावा साबित हुआ है। आज भी पंचायत प्रतिनिधि जातिगत भेदभाव, प्रशासनिक उपेक्षा और हिंसा के दोहरे दंश का सामना करने को विवश हैं। यह रिपोर्ट विकास के दावों के बीच उनके अस्तित्व और अथक संघर्ष की मार्मिक कहानी प्रस्तुत करती है।
इस त्रासदी के मुख्य चार आयाम :
1. आर्थिक बेबसी (गरीबी की जंजीरें):
दलित प्रतिनिधियों की सबसे बड़ी चुनौती उनकी आर्थिक स्थिति है। जब 75% परिवार भूमिहीन होते हैं और परिवार का मुखिया स्वयं मजदूरी पर निर्भर होता है, तो उन्हें प्रभावशाली व्यक्तियों और भ्रष्ट ठेकेदारों के सामने झुकने के लिए विवश होना पड़ता है। यह “खाली पेट की राजनीति” की विडंबना है, जहाँ पद तो है, परंतु स्वायत्तता का अभाव है।
2. सत्ता का छलावा (मुखौटा लोकतंत्र):
राजनीतिक सहभागिता प्रायः केवल प्रतीकात्मक सिद्ध होती है।
- मुखिया-पति राज: महिला आरक्षित सीटों पर वास्तविक शक्ति पुरुषों (पतियों) के नियंत्रण में रहती है, जिसके परिणामस्वरूप निर्वाचित महिलाएँ केवल ‘रबर स्टैंप’ बनकर रह जाती हैं।
- अविश्वास प्रस्ताव का भय: जब कोई दलित मुखिया स्वतंत्र रूप से कार्य करने का प्रयास करता है, तो उच्च जातियों का समूह ‘अविश्वास प्रस्ताव’ का उपयोग कर उसे पद से हटाने की साजिश रचता है।
3. व्यवस्था की क्रूरता (प्रशासनिक अपमान):
जिस नौकरशाही को सहायक होना चाहिए, वही सबसे बड़ी बाधा बन गई है। अधिकारियों द्वारा दलित प्रतिनिधियों को “पागल” कहना या उनकी उपेक्षा करना यह दर्शाता है कि पदों पर बैठे व्यक्तियों की मानसिकता आज भी सामंती है। सरकार में दलितों के लिए किसी SC आयोग का न होना, उनकी आवाज़ को दबाने की एक संस्थागत साजिश प्रतीत होती है।
4. सामाजिक दंश (आधुनिक छुआछूत):
संवैधानिक पद पर आसीन होने के बावजूद, समाज द्वारा उनकी स्वीकृति अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। जयपुर गाँव में नाइयों द्वारा बाल काटने से इनकार करना स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यद्यपि कानूनी प्रावधानों में परिवर्तन हुए हैं, तथापि समाज में निहित नस्लीय और जातिगत भेदभावपूर्ण भावनाएँ आज भी विद्यमान हैं।
लोकतंत्र का अधूरा सच
झारखंड में अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि “समानों के बीच असमान” की स्थिति में हैं। उनका संघर्ष केवल विकास हेतु नहीं, अपितु आत्मसम्मान एवं अस्तित्व की रक्षा के लिए भी है। यह मात्र एक समुदाय की पीड़ा नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की नैतिक विफलता का परिचायक है। जब तक एक दलित मुखिया को अपने ही कार्यालय में सम्मान और अपने ही गाँव में सुरक्षा प्राप्त नहीं होगी, तब तक झारखंड का विकास केवल कागजों तक सीमित एक मिथ्या सिद्ध होगा।