झारखंड के दलित समुदाय आज भी इस “अदृश्य दीवार” के पीछे सीमित हैं, जहाँ तकनीकी प्रगति की पहुँच बाधित है। यह स्थिति गरीब और वंचित वर्गों को मुख्यधारा से अलग करती है।
रांची: इक्कीसवीं सदी के भारत में, जहाँ ‘डिजिटल इंडिया’ के माध्यम से वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जा रही है, झारखंड के अनुसूचित जाति (SC) बहुल क्षेत्रों में व्याप्त “नेटवर्क सन्नाटा” एक गंभीर सामाजिक त्रासदी की ओर इशारा करता है। यह मात्र सिग्नल की समस्या नहीं है, बल्कि एक ‘अदृश्य डिजिटल दीवार’ का आधुनिक स्वरूप है। झारखंड के दलित समुदाय आज भी इस “अदृश्य दीवार” के पीछे सीमित हैं, जहाँ तकनीकी प्रगति की पहुँच बाधित है। यह स्थिति गरीब और वंचित वर्गों को मुख्यधारा से अलग करती है। यह परिस्थिति केवल तकनीकी अक्षमता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संरचनात्मक बहिष्करण प्रतीत होता है।
आँकड़ों का फर्क: विकास की अधूरी तस्वीर
झारखंड का डिजिटल परिदृश्य सामाजिक पदानुक्रम का ही प्रतिबिंब है। जब हम इंटरनेट पहुंच के आंकड़ों का जातिगत विश्लेषण करते हैं, तो विकास के दावे अपर्याप्त प्रतीत होते हैं। डिजिटल अवसंरचना सामाजिक असमानता का ही विस्तार प्रतीत होती है। 2024-25 के अनुमानित आंकड़ों का अवलोकन करने पर यह अंतर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है:
यह तालिका स्पष्ट करती है कि झारखंड के अनुसूचित जाति समुदाय के पास न केवल नेटवर्क तक पहुंच की कमी है, बल्कि उपलब्ध नेटवर्क की गुणवत्ता भी अत्यंत निम्न स्तर की है। ग्रामीण क्षेत्रों में SC घरों की वाई-फाई पहुंच सवर्णों की तुलना में आधे से भी कम है, जो उन्हें आवश्यक सेवाओं जैसे ऑनलाइन शिक्षा और ई-गवर्नेंस से वंचित करता है।
उपेक्षा का तकनीकी तंत्र: टावर वहीं, जहाँ मुनाफा
उपयोगकर्ता की यह आशंका कि यह स्थिति “सुनियोजित” है, समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से “इन्फ्रास्ट्रक्चरल वायलेंस“ की पुष्टि करती है। इसके पीछे के कारण गहरे और बहुआयामी हैं:
- आवासीय पृथक्करण और ‘शैडो जोन‘: झारखंड के गांवों में आज भी दलित बस्तियां मुख्य गांव से दूर, अक्सर निचले इलाकों या बाहरी परिधियों पर स्थित होती हैं। निजी टेलिकॉम कंपनियां अपने टावर उन ‘प्रीमियम’ इलाकों में लगाती हैं जहाँ से उन्हें उच्च राजस्व (ARPU) की उम्मीद होती है।
- मर्मभेदी यथार्थ: टावर के रेडियस का अंतिम छोर अक्सर उस दलित टोले पर आकर रुक जाता है, जहाँ से गाँव की गरीबी शुरू होती है। यह “सिग्नल एटेन्यूएशन” (Signal Attenuation) प्राकृतिक कम और सामाजिक अधिक है।
- “राजस्व ग्राम” की प्रशासनिक धुंध: सरकारी दस्तावेजों में जब एक ‘राजस्व ग्राम’ को कनेक्टेड घोषित किया जाता है, तो उसके भीतर के दर्जनों टोलों की वास्तविकता छिप जाती है। मुख्य सड़क पर सिग्नल होने का अर्थ यह निकाल लिया जाता है कि पूरा गांव डिजिटल है। यह डेटा विसंगति ही उन हज़ारों परिवारों के बहिष्करण का आधार बनती है, जो कागजों पर तो ‘डिजिटल’ हैं, लेकिन हकीकत में ‘ऑफलाइन’ हैं।
डिजिटल विफलता और मानवीय दर्द
नेटवर्क न होना केवल मनोरंजन का रुकना नहीं है, बल्कि यह जीने के अधिकार पर चोट है:
- राशन की जंग: ऑनलाइन PDS (राशन प्रणाली) के कारण बायोमेट्रिक मशीन में अंगूठा लगाना अनिवार्य है। नेटवर्क न होने पर बुजुर्ग महिलाओं को पहाड़ियों पर चढ़ना पड़ता है ताकि ‘सिग्नल’ मिल सके और उनके घर का चूल्हा जल सके।
- शिक्षा का नुकसान: ऑनलाइन पढ़ाई के दौर में जहां संपन्न बच्चे हाई-स्पीड इंटरनेट का लाभ उठा रहे हैं, वहीं झारखंड के इन टोलों के बच्चे एक अदद सिग्नल के लिए पेड़ों पर चढ़ने या ऊंचे रास्तों पर भटकने को मजबूर हैं।
नीतिगत खामियां और इंटरनेट शटडाउन
झारखंड में भारतनेट की विफलता (मात्र 38% कवरेज) राज्य की प्रशासनिक शिथिलता को दर्शाती है। इसके साथ ही, परीक्षा में नकल रोकने के नाम पर सरकार द्वारा लगाया जाने वाला ‘इंटरनेट शटडाउन‘ सामूहिक दंड की तरह काम करता है। चूँकि SC समुदायों के पास ब्रॉडबैंड (मात्र 7-8%) नहीं है, वे पूरी तरह मोबाइल डेटा पर निर्भर हैं। शटडाउन उनके लिए बैंकिंग, स्वास्थ्य और संचार के सारे रास्ते बंद कर देता है, जबकि संपन्न वर्ग अपने वाई-फाई के साथ सुरक्षित रहता है।
जारी प्रयास और तकनीकी समाधान: एक समीक्षा
सरकार ने 4G सैचुरेशन प्रोजेक्ट के तहत झारखंड में 755 नए टावर लगाने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, धरातल पर स्थिति यह है कि टावर तो खड़े कर दिए गए हैं, लेकिन बिजली की अनियमितता और उपकरणों की कमी के कारण वे “मूक स्मारक” बने हुए हैं।
परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति (2025):
- LWE फेज-II: उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में 82 टावर।
- PM-JANMAN: विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के लिए महत्वाकांक्षी योजना।
- चुनौती: पलामू, गढ़वा और चतरा जैसे जिलों की ऊबड़-खाबड़ भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक उदासीनता।
समाधान की राह: क्या किया जाना चाहिए?
डिजिटल न्याय की पुकार: झारखंड के अनुसूचित जाति बाहुल्य क्षेत्रों में नेटवर्क की विफलता केवल एक ‘तकनीकी बग’ नहीं है, बल्कि यह डिजिटल रंगभेद का एक स्वरूप है। इसे सुधारने के लिए “राजस्व” की जगह “अधिकार” को केंद्र में रखना होगा।
सुझाव और मार्ग:
- टोला–स्तरीय ऑडिट: राजस्व गांव के बजाय प्रत्येक बस्ती के आधार पर कनेक्टिविटी का ऑडिट हो।
- हाइब्रिड PDS: जब तक नेटवर्क स्थिर न हो, ऑफलाइन बायोमेट्रिक और मैन्युअल रजिस्टर के विकल्प को अनिवार्य बनाया जाए।
- सामुदायिक वाई–फाई: दलित बस्तियों के स्कूलों और पंचायत भवनों में मुफ्त सार्वजनिक वाई-फाई हॉटस्पॉट स्थापित किए जाएं।
निष्कर्ष : डिजिटल क्रांति की सार्थकता इस बात में नहीं है कि शहरों में 5G की गति क्या है, बल्कि इस बात में है कि झारखंड के सबसे दूरस्थ दलित टोले में रहने वाले बच्चे की स्क्रीन पर ज्ञान का उजाला पहुँच रहा है या नहीं। जब तक यह “डिजिटल दीवार” नहीं गिरती, तब तक ‘विकास’ का नारा इस समुदाय के लिए केवल एक प्रतिध्वनि मात्र बना रहेगा।
नोट: यह लेख उपलब्ध शोध और सांख्यिकीय विश्लेषण पर आधारित एक समीक्षात्मक प्रस्तुति है।