झारखंड: दावोस -वैश्विक विजन और धरातलीय द्वंद्

यह आलेख झारखंड के एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है जहाँ ‘वैश्विक दृष्टिकोण’ का सामना ‘स्थानीय वास्तविकताओं’ से है। दावोस की भव्यता और राज्य के जिलों की जमीनी स्थिति के बीच की खाई को पाटना ही हेमंत सरकार के लिए वास्तविक चुनौती है।

रांची: झारखंड का ‘खनिज प्रधान’ पहचान से ‘हरित मूल्य संवर्धन’ (Green Value Addition) की ओर बढ़ना एक साहसिक आर्थिक प्रस्थान है। मुख्यमंत्री की वैश्विक यात्राएं और ‘मारांग गोमके छात्रवृत्ति’ जैसे प्रयास वंचित समुदायों के लिए अंतरराष्ट्रीय क्षितिज तो खोलते हैं, किंतु यह चमक तब तक फीकी है जब तक ‘जस्ट ट्रांजिशन’ की नीतियां कागजों से निकलकर धनबाद और चतरा की कोयला बस्तियों तक नहीं पहुँचतीं।

वर्तमान SC समुदाय की भूमिहीनता और कौशल-अभाव को देखते हुए, यह औद्योगिक छलांग समावेशी होने के बजाय ‘विस्थापन का नया संस्करण’ बनने का जोखिम रखती है। अतः, राज्य को वैश्विक पूंजी के स्वागत के साथ-साथ स्थानीय श्रम के संरक्षण और ‘आजीविका के अधिकार’ के बीच एक अनिवार्य संतुलन साधना होगा, ताकि विकास की इस नई गाथा में हाशिए का समाज केवल मूकदर्शक न बना रहे। अनुसूचित जाति समुदाय की वर्तमान परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में इस विमर्श को सतह पर लाना आवश्यक है।

दावोस -वैश्विक विजन
दावोस -वैश्विक विजन और धरातलीय द्वंद्

​झारखंड का नव-आर्थिक उदय: दावोस की चमक और हाशिए का सच

​झारखंड के आर्थिक इतिहास में वर्तमान दौर एक ‘संक्रमणकालीन संक्रांति’ है। मुख्यमंत्री की अंतरराष्ट्रीय यात्राएं केवल निवेश का निमंत्रण नहीं, बल्कि राज्य के उस पुराने ‘खनिज निर्यातक’ वाले टैग को उतार फेंकने की छटपटाहट है। जहां राज्य अब अपनी नियति ‘खदान’ में नहीं, बल्कि ‘मूल्य संवर्धन’ और ‘मानव पूंजी’ में देख रहा है।

विकास का नया व्याकरण: “जस्ट ट्रांजिशन”

झारखंड के लिए ‘जस्ट ट्रांजिशन’ का अर्थ केवल कार्बन उत्सर्जन कम करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय का परिशोधन करना है।

त्रासदी से न्याय तक: कोयला बेल्ट में बसने वाला SC समुदाय, जिसके पास न जमीन के कागज हैं, न तकनीकी डिग्री, वह विकास की हर लहर में ‘अदृश्य’ रहा है।

परिवर्तन: आजीविका के अधिकार को कानूनी मान्यता देना और भूमिहीनता को मुआवजे के आड़े न आने देना ही इस ‘ट्रांजिशन’ की असली सफलता होगी।

​कौशल: आत्मसम्मान की नई भाषा

​”मारांग गोमके छात्रवृत्ति” ने यह सिद्ध किया है कि झारखंड की प्रतिभा को केवल एक मंच की दरकार थी। लेकिन, असली चुनौती ‘ग्रीन जॉब्स’ और ‘स्किल गैप’ के बीच खड़ी है। जब तक कोयला ढोने वाले हाथों को सोलर पैनल जोड़ने का हुनर नहीं मिलेगा, तब तक वैश्विक निवेश स्थानीय समुदायों के लिए केवल ‘खिड़की से दिखता तमाशा’ बना रहेगा। औद्योगिक विकास और पारिस्थितिक जिम्मेदारी का संतुलन तभी बनेगा जब विकास का केंद्र ‘मशीन’ नहीं, बल्कि ‘मनुष्य’ होगा।

सांस्कृतिक पुनरुत्थान और समावेशी भविष्य

झारखंड 2050 का सपना तभी साकार होगा जब जमशेदपुर की ग्रीन स्टील यूनिट की धमनियों में स्थानीय वंचित युवाओं का पसीना और गौरव बहेगा। विरासत संरक्षण की पहल केवल पर्यटन नहीं, बल्कि उस समुदाय को ‘पहचान का अधिकार’ देने की प्रक्रिया है जिसे अब तक केवल ‘विस्थापित’ कहा गया।

पसीने से साझेदारी तक

​झारखंड की इस वैश्विक यात्रा का वास्तविक लाभ “कैपिटल” (पूंजी) की आमद में नहीं, बल्कि “सोशल जस्टिस” (सामाजिक न्याय) की स्थापना में निहित है। यदि सरकार अपनी प्रतिबद्धताओं को जमीनी स्तर पर उतार पाई, तो झारखंड का SC समुदाय विकास की कीमत चुकाने वाला ‘बलिदान’ नहीं, बल्कि विकास का ‘बराबर का हिस्सेदार’ बनेगा। दावोस से झारखंड ले राज्यों की दूरी तभी कम होगी जब नीतियों का निर्माण ‘एयरकंडीशंड कमरों’ में नहीं, बल्कि ‘खदानों की धूल’ और ‘बस्तियों की उम्मीदों’ को ध्यान में रखकर किया जाएगा।

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