18-19वीं सदी: बुद्ध इतिहास का पुरातात्विक पुनरुदय और धार्मिक संस्थानों का उदय

18वीं और 19वीं शताब्दी, यह कालखंड केवल इतिहास की खोज का नहीं, बल्कि इतिहास के ‘चयन’ का भी था। बुद्ध की उपेक्षा केवल एक महापुरुष की विस्मृति नहीं थी, बल्कि बहुजन पहचान और उनकी सांस्कृतिक जड़ों को काटने की एक अनचाही प्रक्रिया भी प्रतीत होता है।

​रांची: 18वीं और 19वीं शताब्दी का भारत एक ऐसे ऐतिहासिक चौराहे पर खड़ा था जहाँ एक ओर विस्मृत हो चुकी बुद्ध संस्कृति के भौतिक अवशेष ज़मीन की परतों से बाहर निकल रहे थे, तो दूसरी ओर भारतीय समाज के भीतर पारंपरिक धर्म अपनी जड़ों को पुनर्गठित करने के लिए नए संस्थागत ढांचों का निर्माण कर रहे थे। यह कालखंड केवल पुरातात्विक खोजों का समय नहीं था, बल्कि यह इतिहास के निर्माण, उसकी व्याख्या और उसके विनियोग की एक जटिल प्रक्रिया का गवाह था।

एक तरफ अलेक्जेंडर कनिंघम और जेम्स प्रिंसेप जैसे विद्वान बुद्ध के गौरवशाली अतीत को मानचित्र पर उकेर रहे थे, तो दूसरी तरफ ब्रह्म समाज और आर्य समाज, प्रार्थना समाज जैसे नव-गठित संस्थान एक ऐसे राष्ट्र और धर्म की कल्पना कर रहे थे जिसकी धुरी मुख्य रूप से वेदों और उपनिषदों पर टिकी थी।

बुद्ध इतिहास

इस विरोधाभासी स्थिति ने न केवल बुद्ध के वास्तविक इतिहास को मुख्यधारा के धार्मिक विमर्श से बाहर रखा, बल्कि भारतीय बहुजन समाज को उसकी अपनी सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक विरासत से भी वंचित कर दिया। इस रिपोर्ट में पुरातात्विक उत्थान और धार्मिक पुनरुत्थान के बीच के तनावपूर्ण संबंधों का विश्लेषण करते हुए यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि कैसे बुद्ध संस्कृति की उपेक्षा ने बहुजन समाज को एक गहरी ऐतिहासिक और पहचान की क्षति पहुंचाई।

बुद्ध इतिहास का भौतिक पुनरुत्थान: पुरातात्विक साक्ष्यों का अनावरण

​19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक, बुद्ध का इतिहास भारतीय जनमानस की सक्रिय स्मृति से लगभग ओझल हो चुका था। बुद्ध को या तो विस्मृत कर दिया गया था या उन्हें हिंदू अवतार परंपरा के नौवें अवतार के रूप में समाहित कर लिया गया था, जिससे उनकी स्वतंत्र दार्शनिक और सामाजिक पहचान धुंधली हो गई थी। इस अंधकार युग में प्रकाश की पहली किरण तब दिखी जब औपनिवेशिक शोधकर्ताओं ने भारत के प्राचीन स्मारकों में रुचि लेनी शुरू की।

​जेम्स प्रिंसेप और ब्राह्मी लिपि का रहस्योद्घाटन

​बुद्ध के इतिहास की वैज्ञानिक पुनर्प्राप्ति की शुरुआत जेम्स प्रिंसेप के कार्यों से मानी जा सकती है। 1830 के दशक में कलकत्ता टकसाल के अधिकारी प्रिंसेप ने उन शिलालेखों को पढ़ने में सफलता प्राप्त की जो सदियों से अनसुलझे थे। 1837 और 1838 के दौरान प्रिंसेप ने अशोक की ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों को पढ़ा, जिससे सम्राट अशोक के शिलालेखों का अर्थ स्पष्ट हुआ।

इन शिलालेखों ने यह प्रमाणित किया कि मौर्य साम्राज्य के दौरान बुद्ध का धम्म केवल एक स्थानीय संप्रदाय नहीं था, बल्कि एक वैश्विक संस्कृति थी जिसने नैतिकता, करुणा और अहिंसा को राजधर्म के रूप में स्थापित किया था। प्रिंसेप की इस खोज ने अलेक्जेंडर कनिंघम जैसे युवा अधिकारियों को एक नई दिशा दी, जिन्होंने बाद में बुद्ध के जीवन से जुड़े भूगोल को भौतिक रूप से खोजना शुरू किया।

​अलेक्जेंडर कनिंघम और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की भूमिका

अलेक्जेंडर कनिंघम को प्रायः “भारतीय पुरातत्व के जनक” के रूप में जाना जाता है, किंतु उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान बुद्ध के इतिहास को प्रकाश में लाना था। 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना के उपरांत, कनिंघम ने बुद्ध के जीवन से संबंधित चार प्रमुख स्थलों-लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर-सहित अनेक अन्य केंद्रों की पहचान की। कनिंघम ने चीनी यात्रियों ह्वेनसांग और फाह्यान के यात्रा वृत्तांतों को आधार बनाकर उन टीलों का उत्खनन किया, जिन्हें स्थानीय समुदाय मात्र ‘मिट्टी के ढेर’ अथवा ‘पुराने किले’ मानते थे।

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1837 में सारनाथ में हुई प्रारंभिक खुदाई ने उस स्थल को पुनः स्थापित किया जहाँ बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश दिया था। इसके उपरांत, 1851 में साँची के स्तूपों की खुदाई और 1854 में ‘द भिलसा टोप्स’ का प्रकाशन बौद्ध इतिहास के पुनरुत्थान की दिशा में महत्त्वपूर्ण मील के पत्थर सिद्ध हुए। कनिंघम ने यह स्पष्ट किया कि साँची और भरहुत के स्तूपों पर उकेरी गई जातक कथाएँ और प्रतीक भारतीय कला की एक ऐसी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पूर्णतः बौद्ध दर्शन से प्रेरित है।

इन पुरातात्विक गतिविधियों ने भारतीय इतिहास को एक नया कालखंड प्रदान किया, जिसे कनिंघम ने ‘बौद्ध काल’ के रूप में संदर्भित किया। उन्होंने यह तर्क प्रस्तुत किया कि यह काल भारतीय इतिहास का सर्वाधिक समृद्ध और विश्वव्यापी प्रभाव वाला युग था, जो परवर्ती ‘मुस्लिम काल’ और ‘आधुनिक हिंदू काल’ से भिन्न था।

​भारतीय धर्मों का पुनरुत्थान और संस्थागत सुदृढ़ीकरण

​जिस समय बुद्ध के इतिहास के साक्ष्य मिट्टी से बाहर आ रहे थे, उसी समय भारतीय हिंदू समाज के भीतर एक शक्तिशाली संस्थागत परिवर्तन हो रहा था। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में औपनिवेशिक शिक्षा और ईसाई मिशनरियों की चुनौतियों का सामना करने के लिए हिंदू धर्म ने अपने आप को नए संगठनों के माध्यम से परिभाषित करना शुरू किया।

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​ब्रह्म समाज और वेदांतिक श्रेष्ठता

​1828 में राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज ने हिंदू धर्म के सुधार का बीड़ा उठाया, लेकिन उनकी पद्धति मुख्य रूप से उपनिषदों और वेदांत के पुनर्मूल्यांकन पर आधारित थी। हालाँकि राममोहन राय ने बुद्ध की नैतिकता और तर्कवाद का सम्मान किया, लेकिन उन्होंने बुद्ध के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करने के बजाय उन्हें हिंदू धर्म के एक सुधारक के रूप में ही देखा। ब्रह्म समाज ने जिस एकेश्वरवाद और तर्कवाद को बढ़ावा दिया, वह औपनिवेशिक आधुनिकता के करीब था, लेकिन उसने उन पुरातात्विक सत्यों को नज़रअंदाज़ कर दिया जो यह बता रहे थे कि भारत की प्राचीन नैतिकता वेदों के बजाय बुद्ध के धम्म से निकली थी।

​आर्य समाज और वेदों की ओर वापसी

​1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज ने एक अधिक आक्रामक रुख अपनाया। “वेदों की ओर लौटो” के नारे के साथ उन्होंने हिंदू धर्म को एक ऐसे सुदृढ़ सांचे में ढालने की कोशिश की जहाँ वेदों की अचूकता को सर्वोच्च स्थान दिया गया। आर्य समाज ने बुद्ध के उन साक्ष्यों को सिरे से खारिज कर दिया जो वेदों की अधिकारिता को चुनौती देते थे। उनके लिए बौद्ध काल एक ऐसा काल था जिसने भारत को कमजोर किया या उसे वैदिक पथ से भटका दिया। यह एक विडंबना थी कि जब कनिंघम अशोक के शिलालेखों से मानवता और सामाजिक न्याय का संदेश पढ़ रहे थे, तब आर्य समाज वर्ण व्यवस्था को ‘गुण और कर्म’ के आधार पर उचित ठहराने और वैदिक अनुष्ठानों को पुनः स्थापित करने में लगा था।

​प्रार्थना समाज और अन्य क्षेत्रीय आंदोलन

​महाराष्ट्र में प्रार्थना समाज (1867) और सत्यशोधक समाज (1873) जैसे आंदोलनों का उदय हुआ । हालाँकि जोतीराव फुले का सत्यशोधक समाज बुद्ध के सिद्धांतों के काफी करीब था, लेकिन प्रार्थना समाज जैसे कुलीन वर्ग के आंदोलन मुख्य रूप से हिंदू ढांचे के भीतर सुधारों तक सीमित रहे। इन संस्थाओं ने अपनी पत्रिकाओं, स्कूलों और सभाओं के माध्यम से एक ऐसा विमर्श तैयार किया जिसने बुद्ध के इतिहास को या तो पूरी तरह से उपेक्षित रखा या उसे हिंदू संस्कृति के एक उप-अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया।

बौद्ध संस्कृति की उपेक्षा और विनियोग की कार्यप्रणाली

​19वीं सदी के दौरान बुद्ध के इतिहास की उपेक्षा केवल चुप्पी तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें एक सक्रिय विनियोग की प्रक्रिया भी शामिल थी। जैसे-जैसे पुरातात्विक साक्ष्य यह सिद्ध कर रहे थे कि भारत के अधिकांश प्राचीन स्मारक बौद्ध मूल के हैं, वैसे-वैसे इन स्मारकों को ‘हिंदू’ पहचान देने की कोशिशें तेज़ हो गईं।

​महाबोधि मंदिर विवाद: एक केस स्टडी

​बोधगया का महाबोधि मंदिर इस विनियोग का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। 16वीं शताब्दी में बौद्ध धर्म के पतन के बाद, यह मंदिर शैव महंतों के नियंत्रण में चला गया था। 19वीं शताब्दी में जब कनिंघम ने मंदिर के बुद्ध मूल को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया और इसकी मरम्मत करवाई, तब भी महंतों का कब्जा बरकरार रहा।

ब्रिटिश प्रशासन ने महंत के मालिकाना हक को कानूनी मान्यता दी, जिससे बुद्ध के सबसे पवित्र स्थल पर बौद्धों का अधिकार सीमित हो गया। हिंदू पुनरुत्थानवादी संस्थानों ने इस स्थिति का समर्थन किया और बुद्ध को ‘विष्णु का अवतार’ बताकर मंदिर में हिंदू अनुष्ठानों को जारी रखने का तर्क दिया। 1890 के दशक में अनगारिक धर्मपाल और महाबोधि सोसाइटी का संघर्ष इसी उपेक्षा और विनियोग के खिलाफ एक बड़ी प्रतिक्रिया थी।

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​झारखंड के ईटखोरी में इतिहास का रूपांतरण

​झारखंड का ईटखोरी (चतरा) बुद्ध संस्कृति के दमन और रूपांतरण का एक और मूक गवाह है। यहाँ पुरातात्विक खुदाई में 9वीं और 10वीं शताब्दी के बौद्ध स्तूप और मूर्तियां मिली हैं। यहाँ एक अद्भुत स्तूप पाया गया है जिसमें 1008 बुद्ध मूर्तियां उकेरी गई हैं, लेकिन आज इसे स्थानीय हिंदू श्रद्धालुओं द्वारा ‘सहस्त्रलिंग’ (शिवलिंग) के रूप में पूजा जाता है।

स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, बुद्ध की मौसी प्रजापति गौतमी उन्हें खोजते हुए यहाँ आई थीं और उनके शब्द “इति खोई” (यहीं खो गया) से इस जगह का नाम ईटखोरी पड़ा। बावजूद इन स्पष्ट साक्ष्यों के, इस स्थल को आज ‘माँ भद्रकाली’ के हिंदू मंदिर परिसर के रूप में प्रचारित किया जाता है, जिससे इसके मूल बौद्ध इतिहास की पहचान गौण हो गई है।

नामकरण और मिथकीकरण के माध्यम से उपेक्षा

​बुद्ध के इतिहास को मिटाने का एक सूक्ष्म तरीका नामकरण था। बिहार और उत्तर प्रदेश के कई बौद्ध स्तूपों को 19वीं सदी के गजेटियर्स में ‘देउरा’ (देव-स्थान) या ‘मंदिर’ के रूप में दर्ज किया गया । वैशाली के अवशेषों को ‘राजा विशाल का गढ़’ कहा गया, जिससे बुद्ध के गणतांत्रिक और धार्मिक महत्व को राजसी वैभव की आड़ में छिपा दिया गया। इस काल के हिंदू सुधारकों ने कभी भी इन टीलों की स्वतंत्र बुद्ध पहचान को मान्यता देने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उन्हें ‘सनातन धर्म’ के खंडहरों के रूप में ही देखा।

​भारतीय बहुजन समाज की ऐतिहासिक क्षति

​बुद्ध के इतिहास की यह सुनियोजित उपेक्षा केवल ईंट और पत्थरों की क्षति नहीं थी, बल्कि यह भारतीय बहुजन समाज के आत्म-सम्मान और ऐतिहासिक चेतना की एक अपूरणीय क्षति थी। बहुजन समाज, जिसमें वर्तमान की अनुसूचित जातियां, जनजातियां और पिछड़ी जातियां शामिल हैं, ऐतिहासिक रूप से बौद्ध धम्म के मूल्यों से जुड़ा था।

​सांस्कृतिक पहचान का ह्रास

​बुद्ध का धम्म एक ऐसा दर्शन था जिसने जाति आधारित पदानुक्रम को नकारा और समता का संदेश दिया। जब 19वीं सदी में इस इतिहास को दरकिनार किया गया, तो बहुजन समाज के पास अपनी सामाजिक दासता के खिलाफ खड़ा होने के लिए कोई ऐतिहासिक ढांचा नहीं बचा।

हिंदू सुधार आंदोलनों ने उन्हें ‘हिंदू’ के रूप में संगठित तो किया, लेकिन उन्हें वही पुरानी वर्ण व्यवस्था की बेडियों में जकड़े रखा, जहाँ वे हमेशा ‘निचले’ पायदान पर रहे। बुद्ध के गौरवशाली अतीत की जानकारी न होने के कारण बहुजन समाज अपनी स्थिति को अपनी नियति मानने लगा, जिसे डॉ. अंबेडकर ने ‘मानसिक गुलामी’ कहा था।

​अछूत प्रथा और बुद्ध इतिहास का दमन

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​डॉ. अंबेडकर का तर्क था कि भारत में ‘अछूत’ वे लोग थे जिन्होंने ब्राह्मणवादी पुनरुत्थान के दौरान बौद्ध धर्म का त्याग करने से इनकार कर दिया था। अतः, बुद्ध के इतिहास की उपेक्षा करना वास्तव में अछूतों के मूल अस्तित्व की उपेक्षा करना था। यदि 19वीं सदी में कनिंघम की खोजों को सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाता, तो यह स्पष्ट हो जाता कि आज के बहिष्कृत समाज का अतीत सम्राटों और महान भिक्षुओं का रहा है। इस सत्य को छिपाकर इन संस्थाओं ने अस्पृश्यता की व्यवस्था को बनाए रखने में परोक्ष भूमिका निभाई।

​जोतीराव फुले और ‘बलि राजा’ का विमर्श

​महात्मा जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में इस क्षति को गहराई से समझा था। अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ (1873) में उन्होंने आर्य आक्रमण सिद्धांत को उलटते हुए बताया कि भारत के मूल निवासियों (शूद्र-अतिशूद्र) को छल और हिंसा से गुलाम बनाया गया। फुले ने ‘बलि राजा’ के शासन को भारत का ‘स्वर्णिम युग’ माना, जो वास्तव में बुद्ध के समतावादी शासन का एक लोक-स्मृति वाला रूप था। फुले के आंदोलनों को यदि बुद्ध के पुरातात्विक साक्ष्यों का सक्रिय सहयोग मिलता, तो बहुजन क्रांति 19वीं सदी में ही अपनी जड़ें जमा लेती। लेकिन, तत्कालीन बुद्धिजीवी वर्ग ने कनिंघम के साक्ष्यों को केवल ‘पुरातन वस्तुओं’ तक सीमित रखा और उन्हें सामाजिक बदलाव का उपकरण नहीं बनने दिया ।

पुरातात्विक सत्य बनाम संस्थागत मिथक

19वीं सदी के भारत में ज्ञान के दो समानांतर और विरोधाभासी स्रोत सक्रिय थे। एक ओर ‘वैज्ञानिक पुरातत्व’ था जो मिट्टी से बुद्ध को निकाल रहा था, और दूसरी ओर ‘धार्मिक पुनरुत्थानवाद’ था जो प्राचीन ग्रंथों की नई और अक्सर संकुचित व्याख्याएं कर रहा था।

इसकी तुलना से स्पष्ट होता है कि जहाँ पुरातत्व विभाग बुद्ध के माध्यम से भारत की एक वैश्विक और समावेशी पहचान बना रहा था, वहीं धार्मिक संस्थान एक ऐसी संकीर्ण पहचान गढ़ रहे थे जिसमें बुद्ध के लिए कोई स्वतंत्र स्थान नहीं था। कनिंघम ने जहाँ भारत के अतीत को ‘बौद्ध काल’ में विभाजित किया, वहीं हिंदू सुधारकों ने उसे ‘हिंदू पतन’ का काल मानकर उसे उपेक्षित कर दिया।

​20वीं सदी में क्षति की भरपाई: अंबेडकर और नवयान

19वीं सदी की इस ऐतिहासिक उपेक्षा की भरपाई 20वीं सदी के मध्य में डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा संभव हुई। अंबेडकर ने कनिंघम के पुरातात्विक साक्ष्यों और बुद्ध के सिद्धांतों को जोड़कर बहुजन समाज की नई पहचान गढ़ी।

​1956 का धर्मांतरण: इतिहास के साथ पुनर्मिलन

14 अक्टूबर 1956, नागपुर में लाखों अनुयायियों के साथ बाबासाहेब का बौद्ध धर्म अपनाना केवल एक धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह बुद्ध के उस इतिहास की ओर लौटना था जिसे 19वीं सदी के संस्थानों ने छिपाने की कोशिश की थी। अंबेडकर ने ‘बुद्ध और उनका धम्म’ (The Buddha and His Dhamma) के माध्यम से बुद्ध को एक सामाजिक क्रांतिकारी के रूप में प्रस्तुत किया।

​नवयान (नया मार्ग) के माध्यम से पहचान का पुनरुद्धार

अंबेडकर द्वारा स्थापित ‘नवयान’ ने बहुजन समाज को उनकी वह ऐतिहासिक विरासत पुनः प्रदान की, जो 19वीं सदी के विनियोग में विलुप्त हो गई थी। उन्होंने बुद्ध को विष्णु के अवतार की अवधारणा से मुक्त कर एक स्वतंत्र मानवतावादी प्रतीक के रूप में स्थापित किया।

वर्तमान चुनौतियां और अधूरा संघर्ष

​19वीं सदी में शुरू हुई बुद्ध इतिहास की उपेक्षा और विनियोग की प्रक्रिया आज भी समाप्त नहीं हुई है। आज भी महाबोधि मंदिर जैसे स्थलों पर बौद्धों को अपने पूर्ण अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। फरवरी 2025 में बोधगया में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि ऐतिहासिक अन्याय अभी भी कायम है।

​ईटखोरी और कोलुआ पहाड़ी जैसे स्थलों पर आज भी पुरातात्विक साक्ष्य उपेक्षित हैं, जबकि धार्मिक संस्थानों द्वारा उनका हिंदूकरण जारी है। यह स्थिति न केवल इतिहास के साथ छेड़छाड़ है, बल्कि यह उन करोड़ों बहुजनों की सांस्कृतिक जड़ों पर हमला है जो आज भी अपने इतिहास की खोज में भटक रहे हैं।

​निष्कर्ष: 18वीं और 19वीं शताब्दी के उस उपेक्षा ने बहुजन समाज को उनकी सबसे शक्तिशाली सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत से दूर कर दिया, जिससे उन्हें सदियों तक दासता और अपमान का सामना करना पड़ा। आज जब हम बुद्ध के इतिहास को पुरातात्विक साक्ष्यों के माध्यम से देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि भारत की मूल पहचान समावेशी, तर्कवादी और समतावादी थी। 19वीं सदी के धार्मिक संस्थानों ने इस पहचान की उपेक्षा करके भारत को एक ऐसी दिशा में धकेला जहाँ जातिगत भेदभाव और सांस्कृतिक विनियोग सामान्य हो गए।

ऐसे में बहुजन समाज की क्षति की भरपाई तभी संभव है जब बुद्ध के वास्तविक इतिहास को न केवल स्मारकों के रूप में, बल्कि समाज के नैतिक और दार्शनिक आधार के रूप में पुनः स्थापित किया जाए।

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