बाबा साहब के विजन को ऑक्सफैम की वैश्विक मुहर

ऑक्सफैम की रिपोर्ट, डॉ. अंबेडकर के जाति विहीन समाज के लक्ष्य की दिशा में आरक्षण को एक मजबूत सीढ़ी मानती है। यह भी स्पष्ट करता है कि बाबा साहब ने आरक्षण को बैसाखी नहीं, बल्कि एक लॉन्चपैड था।

रांची: ऑक्सफैम द्वारा भारत की आरक्षण नीति की वैश्विक सराहना, वास्तव में डॉ. बी.आर. अंबेडकर (बाबा साहब) की उस गहन दूरदर्शिता और संवैधानिक बुद्धिमत्ता की समकालीन पुष्टि है, जिसकी आधारशिला उन्होंने दशकों पूर्व स्थापित की थी। CRI इंडेक्स (असमानता घटाने की प्रतिबद्धता सूचकांक) के परिप्रेक्ष्य में बाबा साहब के विचारों का एक तथ्यात्मक विश्लेषण:

बाबा साहब के विजन को ऑक्सफैम की वैश्विक मुहर
बाबा साहब के विजन

‘दान’ नहीं, ‘अधिकार’ का दर्शन

ऑक्सफैम ने यह स्वीकार किया है कि यह नीति केवल कल्याणकारी नहीं है, बल्कि यह बाबा साहब के उस मूलभूत विचार का प्रतिबिंब है कि “SC-ST-OBC को दया नहीं, अधिकार चाहिए।”

​बाबा साहब का स्पष्ट मत था कि ऐतिहासिक अन्याय का मुकाबला केवल आर्थिक सहायता से नहीं किया जा सकता। उन्होंने आरक्षण को ‘क्षतिपूर्ति के सिद्धांत’ के रूप में देखा। ऑक्सफैम की रिपोर्ट पुष्टि करती है कि संरचनात्मक असमानता को तोड़ने के लिए राज्य का हस्तक्षेप अनिवार्य है, जिसे बाबा साहब ने संविधान में ‘मौलिक अधिकारों’ के साथ जोड़ा।

​सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना (Social Democracy)

​ऑक्सफैम द्वारा ‘ऐतिहासिक अन्याय के समाधान’ की प्रशंसा बाबा साहब के सामाजिक लोकतंत्र के स्वप्न को रेखांकित करती है।

समीक्षा: संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में डॉ. अंबेडकर ने चेतावनी दी थी: राजनीति में हमारे पास समानता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता। यदि हमने इस विरोधाभास को जल्द नहीं मिटाया, तो पीड़ित लोग उस लोकतंत्र के ढांचे को उड़ा देंगे जिसे हमने इतनी मेहनत से बनाया है।

​ऑक्सफैम की रिपोर्ट यह सिद्ध करती है कि आरक्षण वह सेफ्टी वाल्व और समतल करने वाला यंत्र है, जिसने भारतीय लोकतंत्र को बिखरने से बचाया और समावेशी बनाया।

​सत्ता में भागीदारी (Representation in Power)

​रिपोर्ट में ‘राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व’ की सराहना बाबा साहब के उस कथन को सत्य साबित करती है कि राजनीतिक सत्ता वह चाबी है जिससे सभी ताले खोले जा सकते हैं।

  • बाबा साहब इस बात से भली-भांति अवगत थे कि जब तक नीति-निर्माण (नौकरशाही और विधायिका) में वंचित वर्ग का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक असमानता का उन्मूलन संभव नहीं है। ऑक्सफैम ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि भारत का मॉडल केवल धन का वितरण नहीं करता, बल्कि ‘शक्ति का वितरण’ भी करता है। वैश्विक परिदृश्य में यह एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ राज्य ने संविधान के माध्यम से ‘शक्तिहीन’ वर्गों को ‘शक्ति’ में भागीदार बनाया है।

​सकारात्मक कार्रवाई का वैश्विक मॉडल

अफ्रीका और अन्य देशों के लिए एक आदर्श के रूप में इसकी मान्यता यह दर्शाती है कि बाबा साहब का दर्शन केवल भारत तक ही सीमित नहीं था; वे मानवाधिकारों के एक सार्वभौमिक विचारक थे।

  • ​दुनिया के कई देशों में नस्ल या जाति के आधार पर भेदभाव होता है, लेकिन भारत जैसा संवैधानिक उपचार विरले ही कहीं है। ऑक्सफैम द्वारा इसे ‘साहसी कदम’ कहना बाबा साहब की उस दृढ़ इच्छाशक्ति को नमन है, जिन्होंने भारी विरोध के बावजूद इसे संवैधानिक रूप दिया।

एक समीक्षात्मक दृष्टि

​ऑक्सफैम की रिपोर्ट, डॉ. अंबेडकर के जाति विहीन समाज के लक्ष्य की दिशा में आरक्षण को एक मजबूत सीढ़ी मानती है। यह भी स्पष्ट करता है कि बाबा साहब ने आरक्षण को बैसाखी नहीं, बल्कि एक लॉन्चपैड बनाया था। वैश्विक सराहना यह बताती है कि डॉ. अंबेडकर का मॉडल सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास के बीच संतुलन साधने का सबसे व्यावहारिक और प्रभावी तरीका है।

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