“जल-जंगल-जमीन” की राजनीति वाले झारखंड प्रदेश में अनुसूचित जाति समुदाय के लिए भूमि सुरक्षा हेतु सीएनटी/एसपीटी जैसे किसी कठोर कानून का अभाव एक विरोधाभास…
रांची: झारखंड के सामाजिक परिवेश में 12.08% का प्रतिनिधित्व करने वाला अनुसूचित जाति (SC) समुदाय वर्तमान में एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उसे ‘अबुआ सरकार’ के आकर्षक आश्वासनों और एक कठोर, मौन वास्तविकता के बीच संतुलन स्थापित करना पड़ रहा है। विगत छह वर्षों (2019-2025) की अवधि इस समुदाय के लिए ‘प्रतीक्षा’ का पर्याय बन गई है—अपने अधिकारों, रोजगार के अवसरों और संवैधानिक सम्मान की प्रतीक्षा।
आरक्षण: हक या सियासी शतरंज?
राज्य सरकार ने एससी आरक्षण को 10% से बढ़ाकर 12% करने का प्रस्ताव तो दिया, लेकिन इसे ‘नौवीं अनुसूची’ की कानूनी भूलभुलैया में कैद कर दिया। यह कदम समुदाय के लिए मरहम कम और ‘मृगतृष्णा’ अधिक साबित हुआ। बिना ठोस डेटा और जातिगत जनगणना के उठाया गया यह कदम, न्याय देने के बजाय जिम्मेदारी को केंद्र के पाले में डालने की एक सियासी चाल बनकर रह गया। परिणाम यह है कि आज भी युवा उसी पुरानी व्यवस्था में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।
रोजगार और शिक्षा: टूटती नींव
किसी भी समाज की रीढ़ उसकी शिक्षा और रोजगार होता है, लेकिन झारखंड में ये दोनों ही मोर्चे ध्वस्त नजर आते हैं।
- शिक्षा का सन्नाटा: राज्य के 8,000 से अधिक सरकारी स्कूल केवल ‘एक शिक्षक’ के भरोसे चल रहे हैं। जहाँ 84% बच्चे इसी वंचित समाज से आते हैं, वहाँ शिक्षकों का न होना मात्र प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के भविष्य की ‘संस्थागत हत्या’ है।
- नौकरियों का अकाल: जब सरकारी महकमों में 49% पद खाली हों, तो ‘सामाजिक न्याय’ की बात बेमानी लगती है। स्थायी नियुक्तियों की जगह ‘संविदा’ (Contract) की प्रथा ने युवाओं को शोषण के चक्र में फंसा दिया है। बैकलॉग के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है, जिससे समुदाय की प्रतिभा कुंठित हो रही है।
भूमि और आर्थिक सुरक्षा: अपनी जमीन पर बेगाने
“जल-जंगल-जमीन” की राजनीति वाले प्रदेश में अनुसूचित जाति समुदाय के लिए भूमि सुरक्षा हेतु सीएनटी/एसपीटी जैसे किसी कठोर कानून का अभाव एक विरोधाभास है। “भूमि अधिकार कानून” का वादा चुनावी घोषणाओं में कहीं लुप्त हो गया है। वहीं, आर्थिक मोर्चे पर सरकार अनुदान के बजाय ऋण वितरित कर रही है। तेलंगाना के “दलित बंधु” मॉडल की तरह सीधा निवेश करने के स्थान पर, यहाँ की योजनाएँ युवाओं को बैंक प्रक्रियाओं और गारंटी के जटिल जाल में उलझा रही हैं।
न्याय की धीमी रफ्तार
अत्याचार निवारण अधिनियम (PoA) के अंतर्गत दोषसिद्धि दर में गिरावट और विशेष न्यायालयों की अनुपलब्धता यह दर्शाती है कि अपराधी बेखौफ हैं और पीड़ित निराश। न्याय प्राप्ति में विलंब होने पर, इसे न्याय के बजाय ‘व्यवस्थागत अन्याय’ के रूप में देखा जाता है।
दिशा बदलने की जरूरत
झारखंड में अनुसूचित जाति के कल्याण की फाइलें मोटी होती जा रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कमजोर। यह केवल 12.08% आबादी का सवाल नहीं है, बल्कि राज्य की उस अंतरात्मा का सवाल है जो समानता की शपथ लेती है।
जरूरत है कि सरकार ‘प्रतीकात्मक राजनीति’ से बाहर निकलकर ‘ठोस कार्यान्वयन’ की ओर बढ़े।
- स्कूलों में शिक्षक चाहिए, एक कमरे की इमारत नहीं।
- मुझे रिक्त पदों पर स्थायी रोज़गार की तलाश है, न कि संविदा आधारित भूमिका की।
- और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरक्षण और भूमि के मुद्दों पर कानूनी दांव-पेच के बजाय स्पष्ट इरादे की आवश्यकता है।
मसलन, जब तक नीतियां केवल ‘वोट’ प्राप्त करने के बजाय ‘मूल्यों’ पर आधारित नहीं होंगी, तब तक झारखंड में ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा एक अधूरी आकांक्षा ही बनी रहेगी।